आलेख – कामेश्वर पांडे
वंदे मातरम् की ओर बहकाए गए राजनीतिक विमर्श को इस वाकये ने फिर असली मुद्दों की पटरी पर ला दिया है।
20 जुलाई को जंतर-मंतर की ओर जा रहे छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई के दौरान पैलेट गन चलाए जाने की बात सामने आई थी। सरकार और उसके समर्थक तब इसे नकारते रहे। लेकिन बाद में CRPF की आंतरिक जाँच में सामने आया कि RAF के एक जवान ने सात पैलेट राउंड चलाए थे, जिनमें पाँच प्रदर्शनकारियों को लगे और दो जमीन पर गिरे। यानी अब यह कहना कि पैलेट गन चली ही नहीं, तथ्यों के सामने टिकता नहीं है।
इसी घटना में घायल 19 वर्षीय छात्र साहिल लोचाब की शिकायत पर FIR दर्ज कराने के लिए राहुल गाँधी को दो थानों की खाक छाननी पड़ी। 21 अगस्त को वे साहिल और उसकी माँ के साथ संसद मार्ग थाने पहुँचे। FIR दर्ज न होने पर वहीं धरने पर बैठ गए। छह-सात घंटे से अधिक के धरने के बाद दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज की। उसमें भारतीय न्याय संहिता की धारा 118(1) और 125 लगाई गई हैं। राहुल गाँधी ने इसे न्याय की दिशा में पहला कदम कहा।
राहुल गाँधी ने जो सवाल उठाया, वह केवल साहिल का सवाल नहीं है—अगर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष को FIR दर्ज कराने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ सकता है, तो आम आदमी की क्या बिसात है?
FIR दर्ज हो जाना न्याय नहीं है। इससे दोष सिद्ध नहीं हो जाता और न ही अपने-आप किसी अधिकारी या जवान की जिम्मेदारी तय होती है। लेकिन यह कम-से-कम न्यायिक प्रक्रिया की ओर जाने का संस्थागत रास्ता खोलता है। परिस्थितियाँ लोकतांत्रिक बनी रहीं और जाँच निष्पक्ष हुई तो दोषियों को न्यायिक कार्रवाई से गुजरना ही पड़ेगा।
लेकिन इस पूरे मामले का दूसरा पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
भाजपा के अनेक नेताओं और गोदी मीडिया की बहसों में शुरू से यह साबित करने की कोशिश हुई कि लाठी-पैलेट चली ही नहीं। सैकड़ों वीडियो, अस्पतालों में पहुँचे घायल छात्र और अब CRPF की अपनी जाँच—इन सबके बाद भी घटना से इनकार करने की बेशर्मी समझ से परे है। पैलेट गन के इस्तेमाल की जाँच स्वयं CRPF ने शुरू की थी और उसकी आंतरिक पड़ताल में उसके इस्तेमाल की पुष्टि संबंधी तथ्य सामने आए।
इसके लिए छत्तीसगढ़ी में एक कहावत इतनी मारक है कि उसे उसी जगह और उसी जमाने में कहा जा सकता था। आज तो ‘आहत आस्था’ FIR दर्ज करा सकती है। किसी भाई को वह कहावत याद आती हो तो मन ही मन दोहरा कर अपनी भड़ास निकाल सकता है।
इस FIR की खूब चर्चा हो रही है। इसे राहुल गाँधी के मुद्दे पर टिके रहने की रणनीति और संघर्ष की जीत माना जा रहा है। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि इससे न केवल युवाओं, बल्कि लोकतांत्रिक मिजाज के लोगों में भी राहुल गाँधी के प्रति भरोसा बढ़ेगा। क्योंकि उन्होंने किसी अमूर्त राजनीतिक मुद्दे पर नहीं, एक घायल युवा के अधिकार के लिए पुलिस थाने में बैठकर लड़ाई लड़ी है।
अब राँची का प्रसंग सामने रखकर यह कहा जा रहा है कि राहुल गाँधी युवाओं के आंदोलन के प्रति दोहरा रवैया रखते हैं।
लेकिन राँची को जंतर-मंतर के आंदोलन के साथ मिला देना तथ्यात्मक भूल होगी।
राँची में JPSC-JSSC परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी अलग-अलग माँगों को लेकर अलग-अलग छात्र समूह आंदोलनरत रहे हैं। एक प्रदर्शन में छात्रों ने हेमंत सोरेन और राहुल गाँधी के पुतले जलाए। छात्र नेता रविंद्र पासवान ने राहुल गाँधी पर छात्रों की समस्याओं की अनदेखी का आरोप लगाया।
लेकिन यह राँची के पूरे छात्र आंदोलन की एकमत राजनीतिक अभिव्यक्ति नहीं थी। वहाँ अलग-अलग गुट और संगठन अपनी-अपनी माँगों को लेकर सक्रिय थे; ABVP भी अलग छात्र संगठन के रूप में वहाँ आंदोलन कर रहा था। इसलिए राँची के किसी एक गुट के राहुल-विरोध को जंतर-मंतर के पूरे Gen Z आंदोलन की राय मान लेना उचित नहीं होगा।
और एक तथ्य यह भी है कि राहुल गाँधी ने राँची के आंदोलनकारी छात्रों से फोन पर बात की थी और बाद में हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर उनसे छात्रों से मिलने और उनकी समस्याएँ सुनने का आग्रह किया था। इसलिए उनका राँची न जाना अपने-आप में ‘युवाओं के प्रति दोहरे रवैये’ का प्रमाण नहीं बन जाता।
असल सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या Gen Z को समझने की कोशिश हो रही है या उसके नाम पर एक नकली Gen Z गढ़ने की कोशिश?
इस सवाल का जवाब घटनाक्रम में तलाशिए।
30 जुलाई को RSS के सह-सरकार्यवाह अतुल लिमये ने जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन को ‘संविधान-विरोधी’ और ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताया था। उन्होंने इसमें ‘अराजकतावादी शक्तियों’ और वामपंथ की भूमिका की आशंका जताई थी।
और इसके कुछ ही दिन बाद, 6 अगस्त को मोहन भागवत ने Gen Z और Gen Alpha के युवाओं से संवाद करते हुए कहा कि प्रदर्शन करने वाली Gen Z को राष्ट्र-विरोधी नहीं कहा जा सकता; वे ‘हमारे अपने लोग’ हैं। उन्होंने Gen Z पर भरोसा जताया और उसकी शिकायतों को सुनने की जरूरत बताई।
दोनों बयानों के बीच का फर्क बहुत कुछ कहता है।
मोहन भागवत का युवाओं से संवाद करना अपने-आप में स्वागतयोग्य है। राजनीतिक-सामाजिक संगठन युवाओं से संवाद करें, यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। लेकिन सवाल यह है कि जिस Gen Z ने सत्ता से सवाल पूछे, उसे पहले राष्ट्र-विरोधी बताने और फिर उसी Gen Z को अपने साथ जोड़ने की कोशिश के बीच क्या बदला?
प्रधानमंत्री मोदी ने भी जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद Instagram पर युवाओं को संबोधित करने का नया अंदाज अपनाया। उनकी ओर से लगातार युवा-केंद्रित वीडियो और सोशल मीडिया संदेश आए और सरकार ने भी Gen Z तक पहुँच बढ़ाने के लिए Instagram तथा दूसरे प्लेटफॉर्मों पर अभियान तेज किया।
दूसरी तरफ भाजपा सांसद कंगना रनौत ने आंदोलनकारी Gen Z को ‘गटर जेनरेशन’ तक कह दिया था। कुछ ही दिनों बाद, मोहन भागवत द्वारा Gen Z की तारीफ किए जाने के बाद उनका स्वर भी बदल गया और उन्होंने युवाओं को राष्ट्र की धरोहर बताना शुरू कर दिया।
इन घटनाओं को अलग-अलग देखकर शायद कुछ न लगे। लेकिन एक साथ रखिए तो तस्वीर साफ होती है।
पहले वास्तविक, सवाल पूछने वाली Gen Z को बदनाम करो। उसके आंदोलन को राष्ट्र-विरोधी बताओ। उसके सवालों को अराजकता बताओ। और जब महसूस हो कि यह पीढ़ी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हो रही है, तो उसके लिए अपनी सुविधा के मुताबिक एक ‘अच्छी’, ‘देशभक्त’, ‘आज्ञाकारी’ Gen Z की छवि गढ़ो।
यही वह कोशिश है जिसे मैं ‘नकली Gen Z बनाने की कोशिश’ कह रहा हूँ।
लेकिन Gen Z कोई राजनीतिक उत्पाद नहीं है, जिसे प्रचार-तंत्र की मदद से मनचाहे साँचे में ढाला जा सके।
मोहन भागवत ने स्वयं कहा है कि आज की यह पीढ़ी पिछली पीढ़ियों की तरह बड़ों की हर बात आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करती; वह तर्क चाहती है, सवाल करती है और जवाब मांगती है।
इसलिए उसे नकली बनाना आसान नहीं होगा।
पीड़ित Gen Z बहुमत में है।
वह बेरोजगारी देख रही है। भर्ती परीक्षाओं की अव्यवस्था देख रही है। पेपर लीक देख रही है। शिक्षा और रोजगार के संकट को अपने जीवन में महसूस कर रही है। और सबसे बढ़कर—वह अपने सवालों पर सत्ता से जवाब माँग रही है।
जिस पीढ़ी ने सवाल पूछना सीख लिया हो, उसे किसी तैयार राजनीतिक साँचे में वापस नहीं डाला जा सकता।
वंदे मातरम् पर बहस होनी चाहिए। राष्ट्रगीत के इतिहास और सम्मान पर भी होनी चाहिए। लेकिन उसके शोर में घायल साहिल की FIR, पैलेट गन और नागरिक के न्याय के अधिकार का सवाल गायब नहीं होना चाहिए।
लोकतंत्र में राष्ट्रभक्ति का एक अर्थ यह भी है कि राष्ट्र के नाम पर नागरिक के अधिकार को कुचला न जाए।
और फिलहाल पैलेट गन की यह FIR उसी बुनियादी सवाल को फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ले आई है।
(लेखक श्री कामेश्वर पाण्डे, जनवादी लेखक संघ, छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष हैं एवं कुसमुंडा, कोरबा में रहते हैं)



