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बस्तर : नक्सल अंत और विकास की दुविधा

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माओवाद की समाप्ति के दावों के दौर में आगे क्या

– दिवाकर मुक्तिबोध

31 मार्च 2026 अब एकदम करीब है। यह वह तिथि है जब छत्तीसगढ़ दशकों तक नक्सल आतंक व सशस्त्र नक्सलवाद का दंश झेलने के बाद घोषित तौर पर शांति की ओर लौटेगा। केंद्र व राज्य सरकार, विशेषकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की यह बड़ी कामयाबी है कि उन्होंने निर्धारित तिथि के भीतर इसे खत्म करने का जो संकल्प लिया था, वह समय रहते पूरा हो गया। चूंकि अब लगभग समूची नक्सल सेना व उसके कमांडर या तो मारे जा चुके हैं अथवा आत्मसमर्पण कर चुके हैं, लिहाज़ा यह मानकर चलना चाहिए कि अप्रैल की पहली तारीख को नक्सल आतंक के खात्मे का आधिकारिक तौर पर ऐलान कर दिया जाएगा। यदि ऐसा न हो सका तो यह आशंका बनी रहेगी कि बस्तर में नक्सल अवशेषों की राख बाकी है तथा उनमें कभी भी चिंगारी भड़क सकती है।

इस संदर्भ में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का कथन एक चेतावनी की तरह है, जिसमें उन्होंने कहा था कि इस बात की गारंटी नहीं है कि आगे हिंसा नहीं होगी तथा घने जंगलों के गांव सुरक्षित रहेंगे। फिर भी तमाम आशंकाओं के बावजूद यह मानकर चलना चाहिए कि छत्तीसगढ़ से भी आतंकवाद उसी तरह समाप्त हो गया है, जिस तरह पंजाब से हुआ था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यसत्ता के खिलाफ विचारधारा के आधार पर सशस्त्र संघर्ष से केवल खून ही बहता है। वह अनंत काल तक चल नहीं सकता। बस्तर में अस्सी के दशक के बाद सैकड़ों घटनाओं व मुठभेड़ों का अंततः नतीजा क्या निकला? यही न कि हजारों की संख्या में मासूम आदिवासियों के साथ पुलिस व सशस्त्र बलों के जवान मारे गए।

बहरहाल, यह निश्चित है कि छत्तीसगढ़ से नक्सली आतंक व नक्सल विचारधारा की विदाई हो रही है। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि का श्रेय केंद्र सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति, अमित शाह का रणनीतिक कौशल तथा केंद्रीय सुरक्षा बलों व छत्तीसगढ़ राज्य की पुलिस के अथक प्रयासों के साथ ही उन शहीद जवानों को दिया जाना चाहिए, जिन्होंने लंबी लड़ाई में अपने प्राण गंवाए हैं। यही नहीं, इस मौके पर उन सैकड़ों मासूम आदिवासी नागरिकों को भी याद करना जरूरी है, जो पुलिस व नक्सलियों के बीच घात-प्रतिघात के ‘युद्ध’ में बेवजह मारे गए। एक तरफ वे घने जंगलों में सर्चिंग के दौरान पुलिस की असली-नकली मुठभेड़ों व अत्याचार के शिकार हुए, तो दूसरी तरफ उसकी मुखबिरी के आरोप में नक्सलियों की जन-अदालतों में वहशियाना तरीके से मार डाले गए।

इस तरह की बीती तमाम हिंसक घटनाएं अब अतीत की स्मृतियां होने जा रही हैं। वे ऐसे दुःस्वप्नों की तरह हैं, जिन्हें कोई याद करना नहीं चाहेगा। बस्तर में नक्सल आतंकवाद अब इतिहास के गर्त में समा जाएगा। वहां शांति लौट रही है। अब अगले कुछ वर्षों में बस्तर की आबोहवा बदली हुई नजर आएगी। लेकिन वह अमित शाह की सोच का कॉरपोरेट कल्चर वाला बस्तर होगा, जहां सब कुछ होगा, लेकिन मानव विकास के केंद्र में आदिवासी नहीं होंगे।

याद रखें कि जब समूचे इलाके में हिंसा चरम पर थी और सलवा जुडूम शबाब पर था, तब नक्सलियों के भय व पुलिस के अत्याचार से छुटकारा पाने के लिए हजारों आदिवासी अपने गांवों से पलायन करने विवश हुए थे। करीब 250 गांवों के 50,000 से अधिक ग्रामीणों ने सीमावर्ती राज्यों, विशेषकर आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में शरण ली थी। वे अभी लौटे नहीं हैं। इलाके के हिंसा-मुक्त होने की खबर सुनकर वे अपने घरों में लौट आएंगे, इसकी भी गारंटी नहीं है, क्योंकि अंततः यह सरकार के प्रति उनके विश्वास का प्रश्न है, जो फिलहाल नजर नहीं आता।

दो वर्षों के भीतर करीब 3,000 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। इनमें से कितने जेल भेजे जाएंगे, लाखों के इनामी पापा राव व देवजी जैसे दुर्दांत नक्सल कमांडरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को लेकर सरकार का रुख क्या रहेगा, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह तय है कि बहुत से आत्मसमर्पित नक्सलियों को पुनर्वास पैकेज के तहत देर-सबेर उनके गांवों में भेज दिया जाएगा।

केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि केंद्रीय सशस्त्र बलों के जवान बस्तर में अभी एक साल और मौजूद रहेंगे। पर सवाल है- उसके बाद? इस संदर्भ में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि छत्तीसगढ़ में पिछले दो वर्षों के दौरान गंभीर किस्म के अपराधों में भारी वृद्धि हुई है। अगर यही स्थिति रही तो बस्तर और आसपास के इलाकों को नया अपराध-गढ़ बनते देर नहीं लगेगी।
(दिवाकर मुक्तिबोध जी वाल से साभार)

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