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रामायण और महाभारत कविताई उपन्यास – विजय बहादुर सिंह

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जनवादी लेखक संघ मध्यप्रदेश की संगोष्ठी में हरीश पाठक के उपन्यास गांठें पर चर्चा

भोपाल। “रामायण और महाभारत कविता में लिखे गये उपन्यास है। रामायण योजनाबद्ध तरीकों से लिखा गया सुसंगठित समाज है। जबकि महाभारत में आपके भटक जाने का पूरा-पूरा ख़तरा है।”
वरिष्ठ कवि-आलोचक डॉ. विजयबहादुर सिंह ने यह सूत्र रविवार शाम भोपाल की साहित्यिक जमात को सौंपा। अवसर था स्मृतिशेष कवि-उपन्यासकार प्रो. हरीश पाठक के उपन्यास “गाँठें” पर चर्चा का। जनवादी लेखक संघ भोपाल के बैनर तले दुष्यंत कुमार स्मृति पाण्डुलिपि संग्रहालय में आयोजित इस कार्यक्रम में अध्यक्षीय आसंदी से डॉ. विजयबहादुर सिंह ने “गाँठे” की गाँठों को खोलते हुए कहा-‘यह उपन्यास बनते और ध्वस्त होते रिश्तों की तलाश है। जहाँ लेखक की परेशानी और दर्द को समझने की ज़रूरत बार-बार पड़ती है। दिमाग़ में हलचल मचाने की कोशिश स्पष्ट है। साथ ही उन्होंने नसीहत दी कि यदि आप पूरे समय और दुनिया को रेखांकित नहीं कर पाते हैं तो आपके लेखक होने पर सवाल उठना लाज़िमी है। यदि लेखक इतिहास की तरफ़ जाता है। इतिहास को शामिल करता है तो तथ्यों की प्रामाणिकता ज़रूरी है।
मंच के सूत्रधार कवि-लेखक राजेश जोशी ने साहित्य में लगभग साथ-साथ क़दमताल करनेवाले लेखक मित्र प्रो. हरीश पाठक का परिचय देते हुए कहा कि डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की पीढ़ी के बाद जिन कवियों की सर्वाधिक चर्चा हुई उनमें प्रो. हरीश पाठक प्रमुख हैं।उन्होंने लेखक की प्रमुख कृतियों का उल्लेख किया। श्री जोशी ने कहा-“गाँठे” के केन्द्र में मालवा इंदौर और उज्जैन है। उपन्यास 1830-1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से शुरू होकर मौज़ूदा समय की पड़ताल करता है। बम्बई में रहते हुए भी मालवा की मिट्टी लेखक को बार-बार जब्त करती है जिसमें नर्मदा क्षिप्रा और पंडे बड़ी शिद्दत से दर्ज होते हैं।
लेखक-आलोचक रामप्रकाश त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में कहा-“गाँठे” का शिल्प अनकहे को कैसे कहा जाए इससे ऊपर की बात करता है। यह समाज की तमाम गाँठों को प्रेरित करनेवाला उपन्यास है। जहाँ समाज और हमारी वृत्तियाँ उजागर होती है। जीवनानुभव को समृद्ध करता है। लेखक समाजशास्त्री भी नज़र आता है जो अपने समय को दर्ज करता है।


कथाकार शशांक  के मुताबिक शिल्प के स्तर पर “गाँठें” की भाषा में ऐसी रवानगी है जो सहजता को जन्म देती है। जीवनमूल्यों का संस्कृति से दूर होने की विडम्बना साफ़ दिखाई देती है। उन्होंने कहा-” पात्र प्रभाष की कश्मकश पूरे उपन्यास की चाबी है जो समझने का रास्ता खोलती है।
शुरू में कवि-उपन्यासकार सविता भार्गव ने उपन्यास की पृष्ठभूमि रखते हुए बताया-‘ गाँठें पलायन और विश्वासघात के बीच जीवनमूल्य भी पेश करता है। अपनी पीड़ा को बयान करते हुए लेखक अतीत की छानबीन करता है,जहाँ निराशा गाँठ बनकर चुभती है। तानाबाना आत्मकथात्मक शैली का है। उपन्यास काल सापेक्ष और मूल्य सापेक्ष है।

प्रस्तुति- वसंत सकरगाए

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