Home छत्तीसगढ़ आईटी छापा : दहशत के अलावा मिला क्या?

आईटी छापा : दहशत के अलावा मिला क्या?

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  •  क्या स्थानीय सरकार को अस्थिर करने की थी साजिश
  •  मिला नहीं ढेला, पर अरबों की अफवाह
  •  नक्सल प्रभावित राज्य में अर्धसैनिक बलों को अचानक उतारना कितना जायज

रायपुर। छत्तीसगढ़ में आईटी के ताबड़तोड़ छापे जिस रूप में मारे गए उससे अब प्रदेश के लोगों को लगने लगा कि यह सब एक निर्वाचित सरकार को किसी भी तरह परेशान करने की साजिश है। जैसा कि पूर्व में हुआ करता था , कि आईटी रेड के बाद उनके अधिकारी मीडिया को बता दिया करते थे कि उक्त अधिकारी के घर से कितनी बेनामी संपत्ति व कर चोरी का मामला मिला है। किंतु इस पूरे प्रकरण में सिर्फ अफवाह का बाजार गर्म रहा। सूत्र बताते है, कि पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांड जैसे अधिकारियों के यहां निकला नहीं ढेला, पर चर्चा रहीं कि लाई गई नोट गिनने की मशीन। आखिर प्रदेश की भूपेश सरकार को यह पूरा प्रकरण आनन-फानन में भयभीत करने जैसा बताया जाता है। नक्सल प्रभावित प्रदेश में राज्य सरकार की जानकारी बगैर केन्द्रीय सुरक्षा बलों के 200 जवानों को अचानक उतारकर संविधान विशेषज्ञों के हिसाब से स्थानीय सरकार के कार्य क्षेत्र में अतिक्रमण करना बताया जा रहा है।

सरकार के अधिकारियों पर आईटी का छापा खोदा पहाड़ निकली चुहिया जैसी कहावत को चरितार्थ करने वाली साबित हुई। आखिरकार छत्तीसगढ़ सरकार के अफसरों पर तोहमत लगाने एवं उन्हें आमजनमानस के बीच नीचा दिखाने की नीयत ने 72 घंटे तक चली आईटी के छापे की पोल खोलकर रख दी है। विश्वसनीय सूत्रों का मानना है, कि छत्तीसगढ़ के पूर्ववर्ती सरकार में सेकेण्ड सीएम का अघोषित तमगा हासिल करने वाले शख्स केन्द्र सरकार की मदद लेकर ही प्रदेश के स्वच्छ छवि और अपनी ईमानदारी के बूते काम करने वाले अधिकारियों के घर आईटी का छापा मारने की पहल की थी। इस मामले में मीडिया की भूमिका भी अविश्वसनीय और संदिग्ध रही। जानकार सूत्र बताते है, कि जिनके यहां छापा ही नहीं पड़ा उनके निवास और उनका नाम दिन भर फ्लैश किया जाता रहा, जो मीडिया की अदूरदर्शिता और अपरिपक्तता को दर्शाता है। अराजकतत्वों द्वारा व्हाट्सएप के माध्यम से फैलाई गई खबर की सत्यता की परख किए बिना ही उसे प्रसारित कर दी गई। जिस पर धारा 500 मानहानि क्रिमिनल प्रकरण के तहत संबंधित अधिकारी के द्वारा मीडियाकर्मी भेजे जाने का अधिकार है। ज्ञात हो कि सीएम के एक सीधे सज्जन ओएसडी अरुण मरकाम के घर छापा पडऩे की खबर वायरल कर दी गई, जो कि फर्जी व झूठा साबित हुआ। वहीं एक शराब ठेकेदार व्यवसायी और ब्यूरोके्रेट्स का नाम छापेमारी में शामिल की गई जो ऐसी किसी भी खबरों की फ्रेम में थे ही नहीं।

वहीं दूसरी ओर नक्सलियों से निपटने के लिए आई सीआरपीएफ को रायपुर में उतारकर दहशत फैलाई गई। उसे शहर के मुख्य चौराहों पर तैनात कर आम जनता के बीच भी तनाव का वातावरण निर्मित की गई। इसे भी आईटी छापे से जोड़कर भ्रमित किया गया। आबकारी अधिकारी अरुणपति त्रिपाठी और मुख्यमंत्री की डिप्टी सेक्रेटरी सौम्या चौरसिया के घर भी तीस घंटे बाद भी सिवाय घर को सील करने का कोई कानूनी विकल्प नहीं था। क्योंकि सौम्या चौरसिया का घर बंद था। वहा भी घर के भीतर में कर्मचारी रहने की अफवाह फैलाकर दहशत का वातावरण निर्मित किया गया। उल्लेखनीय है, कि सीनियर आईएएस, रेरा चेयरमेन और अपनी ईमानदारी छवि के लिए पहचान रखने वाले विवेक ढांड के यहां तो आईटी की टीम 48 घंटे की छानबीन के बाद सौ रुपए भी नहीं निकाल पाई। बताया जाता है, कि प्रदेश के बड़े व्यापारियों के यहां छापा मारने पहुंची आईटी की टीम ने दो आईएएस अफसरों को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया क्योंकि भूपेश सरकार के करीबी माने जाते है। ईडी और सीबीआई की टीम रायपुर आने की बात भी कोरी अफवाह साबित हुई। वरिष्ठ आईएएस विवेक ढांड और अनिल टुटेजा के यहां छापेमारी से छत्तीसगढ़ के अफसरों में आक्रोश है। पूरे कैरियर में बेदाग छवि और विशुद्ध छत्तीसगढिय़ा प्रेमी अफसर विवेक ढांड के छत्तीसगढ़ की बौद्धिक संपत्ति के रुप में देखे जाते है।

ऐसे कत्र्तव्यनिष्ठ छत्तीसगढिय़ा अफसर पर सेवानिवृत्ति के बाद छापेमारी से यह संदेश गया है कि केन्द्र सरकार ने अपने हथकण्डे छत्तीसगढ़ में भी आजमाने शुरु कर दिए है। आखिर इतना सब कुछ होने के बाद आईटी की ओर से मीडिया को जानकारी क्यों नहीं दी गई। सच्चाई तो यह है,कि इन छापों में न तो सीबीआई , न ही इडी और न ही नोटो को गिनने की मशीने लगाई गई। इस कार्रवाई में सीआरपीएफ के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ रहे है, कि जिस सीआरपीएफ को प्रदेश में नक्सल ऑपरेशन के लिए रखा गया है। उसे राज्य सरकार की अनुमति के बिना कैसे इस अभियान में शामिल किया गया। उल्लेखनीय है, कि इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके मंत्रिमण्डल के कड़े तेवर को देखकर आईटी अफसर रातों-रात निकल गए। अन्यथा तीस से चालीस सीनयर अफसरों एवं व्यवसायियों के यहां छापा मारने की तैयारी कर रखी थी। भूपेश बघेल सरकार ने पिछले डेढ़ साल में जिस तरह से उल्लेखनीय कार्य किया है और लगातार केन्द्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते रहे है। कहीं यह छत्तीसगढ़ सरकार को अस्थिर करने की साजिश तो नहीं है? इन सब प्रश्नों का उत्तर के रूप में आमजनता से खुलासा किया जाना चाहिए।

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