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बस्तर के रियासत कालीन होली की शताब्दियों पुरानी अनूठी परंपराएं

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  •  भक्त प्रहलाद और होलिका बस्तर की होली में गौंड़ हो जाते हैं इसके स्थान पर कृष्ण रूप में विष्णु और देवी की पूजा अर्चना होती है, होलिका दहन से पूर्व
  •  बस्तर के रियासत कालीन होली में दंतेवाड़ा का फागुन मंडई, माड़पाल की होली, जगदलपुर की जोड़ा होलिका दहन, कलचा की होली, पुसपाल का होली मेला के विद्यमान हैँ सबसे जुदा विशिष्ट सतरंगी परंपराएं

जगदलपुर। बस्तर संभाग को प्रकृति ने वह सब कुछ प्रदान किया है जिससे विश्व में यह अपनी अलग पहचान स्थापित करता है। क्षेत्रफल के भौगोलिक दृष्टिकोण से केरल राज्य से बड़े भूभाग में विस्तारित वन संपदा-खनिज संपदा से परिपूर्ण ग्रामीण वनवासियों की समृद्ध परंपरा के अनवरत निर्वहन का इतिहास अपनेे में समेटे हुए है। इन्हीं परंपराओं में से एक बस्तर के रियासत कालीन होली की शताब्दियों पुरानी सबसे जुदा विशिष्ट सतरंगी परंपराएं यहां आज भी देखने को मिलते हैं, इसे देखने के लिए पर्यटन विभाग के प्रचार-प्रसार के अभाव के बावजूद देश विदेेश के पर्यटक बस्तर की ओर बरबस खींचे चले आते हैं। पूरे देश सहित बस्तर संभाग में भी आगामी 09 मार्च को होलिका दहन और 10 मार्च को होलीका उत्सव-वसंतोत्सव मनाया जाएगा यहां फर्क सिर्फ इतना है कि बस्तर की होली रियासत कालीन शताब्दियों पुरानी विशिष्ट अनूठी परंपराओं का निर्वाहन से जुड़ा हुआ है। बस्तर की होली में भक्त प्रहलाद और होलिका यहां गौण हो जाते हैं इसके स्थान पर कृष्ण के रूप में विष्णु-नारायण एवं विष्णु के कलयुग के अवतार कलंकी के साथ देवी माँ दंतेश्वरी, माता मावली के पूजा-अर्चना की शताब्दियों पुरानी परंपरा के साथ रंगों का पर्व होली मनाया जाता है। यह बस्तर के ग्रामीणों की आस्था, विश्वास और अपनी समृद्ध परंपरा के अनवरत निर्वहन को होली के अवसर पर यहां साक्षात, पुण्य लाभ प्राप्त करने के साथ प्रतिवर्ष इसी रूप में देखा जा सकता है।
दंतेवाड़ा की फागुन मंडई में बस्तर संभाग की होती है पहली होलिका दहन
दंतेवाड़ा के एतिहासिक रियासत कालीन 09 दिनों तक चलने वाले आखेट नवरात्र पूजा विधान के साथ फागुन मंडई में आंवरामार पूजा विधान के बाद सती सीता स्थल पर बस्तर संभाग की पहली होलिका दहन सती शिला के पास की जाती है। यहां गंवरमार रस्म में गंवर (वनभैंसा) का पुतला तैयार किया जाता है, इसमें प्रयुक्त बांस का ढांचा तथा ताड़-फलंगा धोनी पूजा विधान में प्रयुक्त ताड़ के पत्तों से होली सजती है, होलिका दहन के लिए 07 तरह की लकडिय़ों जिसमे ताड, बेर, साल, पलाश, बांस, कनियारी और चंदन के पेड़ों की लकडिय़ो का इस्तेमाल किया जाता है।
माड़पाल में बस्तर संभाग की होती है दूसरी होलिका दहन
बस्तर के महाराजा पुरुषोत्तम देव भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे। सन 1408 में महाराजा पुरुषोत्तम देव को भगवान जगन्नाथ के श्रेष्ठ सेवक के रूप में रथपति की उपाधि मिलने के बाद सौभाग्य प्राप्त कर लौटते वक्त वे होली की रात माड़पाल गांव पहुंचे और वहीं रुके तथा उन्होंने होलिका दहन भी किया। तब से यह परंपरा लगातार चली आ रही है। संभाग मुख्यालय से 10 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम माड़पाल में आज भी राज परिवार के सदस्य होलिका दहन में भाग लेते हैं। माढ़पाल में होलिका दहन की रात छोटे रथ पर सवार होकर राजपरिवार के सदस्य होलिका दहन कुंड की परिक्रमा कर मां दंतेश्वरी के पूजा अर्चना के बाद होलिका दहन किया जाता है।
बस्तर संभाग की तीसरी एक मात्र जगदलपुर के जोड़ा होलिका दहन
माड़पाल की होलिका दहन के बाद बस्तर संभाग में होलिका दहन किये जाने की परंमपरा आज भी कायम है। रियासत कालीन इस परंपरा में अब कुछ परिवर्तन हो गए हैं पहले माड़पाल में होली जलने के बाद उस होली के आग को जगदलपुर के जोड़ा होलिका दहन स्थल मावली मंदिर के सामने जोड़ा होलिका दहन के लिए लाया जाता था, अब माड़पाल के होलिका दहन से वहां की अग्नि नहीं लाई जाती लेकिन माड़पाल में होली जलाए जाने के बाद जगदलपुर के जोड़ा होलिका दहन के बाद ही बस्तर संभाग के अन्य स्थानों पर होलिका दहन किए जाने की परंपरा आज भी बदस्तूर जारी है।
रंगपंचमी की पूर्व संध्या में कलचा की होती है चौथी होलिका दहन
संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से सात किलोमीटर दूर ग्राम कलचा में होलिका दहन रंगपंचमी की पूर्व संध्या पर की जाती है। होली की रात कलचा में होलिका दहन नही किया जाता है और न ही दूसरे दिन रंग-गुलाल खेला जाता। वहां रंगपंचमी के दिन रंग-गुलाल खेले जाने की परंमपरा है। माड़पाल की होली में राजा के पहुंचने से कलचा के भी लोग माड़पाल होली के उत्सव में शामिल होने की परंपरा के कारण ग्राम कलचा में रंगपंचमी की पूर्व संध्या पर होलिका दहन करने की परंपरा बन गई, तथा यहां पंचमी के दिन रंगोत्सव मनाया जाता है।
ग्राम पुसपाल में होलिका दहन नहीं अपितु यहां होली मेला का होता है आयोजन
बस्तर संभाग के सभी स्थानों पर होलिका दहन का आयोजन स्थानीय देवी देवताओं के पूजा अर्चना के साथ किए जाने की परंपरा है, लेकिन जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम पुसपाल में होलिका दहन नहींं किया जाताा है। यहां होलिका दहन के स्थान पर होली मेला का आयोजन परंपरा अनुसार माता मंदिर में विराजित बहिनिया शीतला, धारणी देवी, परदसिन देवी, भंडारिन देवी, महामाया,आदि सात देवियों और महादेव की पूजा के बाद होली मेला आयोजित किया जाता है। होली मेला के दौरान मनोरंजन के लिए ख्याति नाम नाट मंडली को आमंत्रित किया जाता है, यह पुसपाल होली मेला का आकर्षषण होता है। होली मेला के आयोजन में ग्राम के 500 परिवारोंंं के सहयोग से इसकी व्यवस्था की जाती है। होली मेलाा में 25 गांव के ग्राम देवी-देवता आमंत्रित किए जाते हैं।

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