रायपुर (इंडिया न्यूज रूम):- आज से छियासी वर्ष पहले 25मार्च1931को महान पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी को एक कट्टर हिंसक भीड ने उन्हें तब मार डाला जब वे अकेले ही हिंसक और उनमादी भीड से लोहा ले रहे थे और यह जंग थी भारतीय समाज की कोढ साम्प्रदायिकता से।वे रणछोड न बने ,कानपुर में दंगा शांत करने के लिए मैदान में डटे रहे ,पुलिस निकम्मी, उदासीन,और लापरवाह बनी रहीऔर साम्प्रदायिक रुग्णता और विकृति ने भारत के महान पत्रकार और महान लेखक की जान ले ली।
गणेश शंकर विद्यार्थी महान त्यागी,अडिग और नितांत स्पस्टवादी ,स्वतंत्र पत्रकारिता के हामी,राजनेता,और प्रख्यात व प्रतिबध्द पत्रकार थे। वे एक निर्भीक पत्रकार थे।उन्होंने गिरफतारी जेल,जुर्मानों,और अंग्रेजों की प्रैस सैंसरशिप का मुकाबला किया।वे न तो डरे ,न ही अपने मिशन से डिगे,वे बैखौफ होकर प्रशासन और जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ लिखते और लिखवाते रहे। वे गुलामी और अंग्रेजी साम्राजवाद के परम शत्रु थे ।
देश और जनता को इनके अभिशाप से बचाने के लिए उन्होंने राजनीतिक पत्रकारिता का जोखिम भरा रास्ता चुना ,और अपने लेखों के माध्यम से जनता को जगाया,उन्हेंवाणी प्रदान की एवं दिशा दी,किसानों और मजदूरों की दुर्दशा को अपनी कलम ,अखबार और लेखन के माध्यम से प्रशासन की निष्क्रियता और उपेक्छापूर्ण रवैये पर करारी और सटीक चोट की।वे कलम के निर्भीक योध्दाऔर गरीबों,शोषितों और करोडों वंचितों के मसीहा थे।
उन्होंने अपने अखबार “प्रताप” की भाषा को सरल और लचीला बनाया ताकि जनसाधारण की समझ में आसानी से आ सके .उन्होंने प्रताप को हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और युवा लेखकों के लिए प्रशिक्षण केंद्र बना दिया और जनजागर्ति को खुलेआम प्रेरणा दी. भगतसिंह को एक बडा लेखक बनाने में गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रताप की बडी भूमिका रही है .
उनका प्रताप किसानों मजदूरों का साप्ताहिक बन गया था, उनका साप्ताहिक मजदूरों की पैरवी करने वाला, राजनैतिक बंदियों का कल्याण करने वाला और जनजातियों के हितों की हिफाजत करने के कारण सबका का प्यारा साप्ताहिक बन गया था.
वे बेहद पढाकू, ग्यान अर्जन के व्यसनी और उत्साही अध्ययनकर्ता होने के कारण विद्यार्थी के उपनाम एवं उपाधि से विभूषित हुए. उनका मानना था कि मातृभूमि की सेवा करना हर मनुष्य का कर्तव्य है.वे कहा करते थे कि पत्रकार का समाज के प्रति बडा दायित्व है, वह अपने पाठकों को सही मार्ग पर ले जाये, प्रमाण सहित लिखे, और अपनी गति मति से विवेकशील रहे, मात्र पैसा कमाना ही नही बल्कि लोकसेवा उसका प्रमुख ध्येय है.
गणेश शंकर हिंदू मुस्लिम एकता के सच्चे समर्थक थे, उनका मानना था कि हम पहले हिंदुस्तानी हैं, मजहब बाद की चीज है. अपने इसी उद्देश्य के तहत उन्होंने अखिल भारतीय हिंदुस्तानी बिरादरी नामक संगठन की स्थापना की थी.
वे निर्भीक और साहसी युवकों को बेहद पसंद करते थे, वे क्रांतिकारियों को पुत्र तुल्य समझते थे. उन्होंने क्रांतिकारियोंको प्रश्य, शिक्षा, दीक्षा और आर्थिक मदद दी.प्रताप कार्यालय तमाम क्रांतिकारियों का संगम था.
वे दुनिया के महान मनिशियों की जीवनियां लिखकर लोगों को प्रबुद्घ किया करते थे, वे लोकसेवक पत्रकारिता के पालक पोषक बने रहे.
विद्यार्थी जी आज दुनिया में नही हैं, मगर उनके काम और विचार आज भी जिंदा हैं, सच में वे आज भी जीवित हैं, एक देशभक्त पत्रकार के रूप में, हिंदू मुस्लिम एकता के प्रकाश स्तम्भ के रूप में, क्रांतिकारियों के संगम और मददगार के रूप में. आज जब अखबार के मालिकों ने सम्पादकों की स्वतंत्रता लगभग छीन ली है, और अखबारों को पैसा कमाने का धंधा बना लिया है, तब गणेश शंकर विद्यार्थी जी बहुत बहुत याद आते हैं.



