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अखबारों की छपाई बंद होने से क्या ग्राहक खो सकते हैं अखबार ?

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एक गंभीर संकट प्रिंट मीडिया के सम्मुख खड़ा हो गया है ।

पी सी रथ
रायपुर (इंडिया न्यूज़ रूम) :- सभी प्रकार की आदतों के मद्देनजर माना जाता है कि 15 से 20 दिन जो काम किया जाता है उसकी आदत मानव को हो जाती है या होने लगती है। अखबार समूहों द्वारा ग्राहक बढ़ाने के लिये बहुधा चलाये जाने वाले अभियानों में 15 दिन निशुल्क अखबार बांटकर ग्राहक बनाने की परिपाटी दशकों तक चलाई गई , बाद में प्रारम्भ में गिफ्ट दे कर ग्राहक से ढाई महीने का पैसा ले कर 3 माह तक पेपर देने की स्कीम प्रायः सभी बड़े अखबार अब तक चलाते रहे हैं। इन सबके पीछे वही 15 दिन मुफ्त पढ़ा कर आदत डालनी है ये मनोवैज्ञानिक टैक्टिस काम करती रही है ।

अब लॉक डाउन के कारण पूरे देश के प्रिंट मीडिया के समक्ष यह अनपेक्षित संकट उपस्थित हो गया है कि 15 दिनों के बाद वर्षो का उनका ग्राहक क्या डिजिटल न्यूज की दुनिया से वापस प्रिंट मीडिया की दुनिया में वापस आएगा। प्रसार और पाठकीयता खोने का बहुत बड़ा संकट इन अखबारों के समक्ष है। इसी कारण कोरेना इफेक्ट के कारण एजेंट्स हाकर्स के मनाही के बावजूद दबाव डाल डाल कर ये कुछ दिनों तक काम चलाते रहे । प्रशासन से विशेष छूट की घोषणा करवाई कि वितरण करने वालों को लाकडाउन से छूट दी गयी है, यहां तक कि मुख्यमंत्री से रिकार्डेड बयान तक दिलवाया कि अखबार से कोरेना का संक्रमण नही फैलता, वही व्यापम वाले मुख्यमंत्री ने निहायत ही अवैज्ञानिक बयान देते हुए लगभग हाउडी मोदी शैली में भौंडे ढंग से निरीह हाकर्स की चिंता किये बिना मीडिया कारपोरेट के समर्थन में विज्ञापन किया।

डिजिटल, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से अपने विज्ञापन भाग के कम होते जाने की पीड़ा झेलते हुए समाचार पत्रों के सामने यह संकट खड़ा है कि 18 दिनों के बाद पाठक उसको हाथोहाथ लेता है या नकारता है , ये बहुत कुछ अखबार की अपनी सामग्री पर भी निर्भर करेगा और पाठक की आदतों में आये बदलाव पर भी । फिलहाल इंतजार करना ही मुनासिब होगा कि तत्परता से खबरों को प्रस्तुत करने और विश्वसनीयता को कायम रखने में कौन सफलता से पाठकों का दिल जीत पाता है। पोर्टल इन मामलों में अखबारों के लिए सबसे बड़ी चुनोउती बन कर उभरे हैं जो स्थानीय खबरों की तुरंत प्रस्तुति को ले कर पाठकों को आकर्षित किये हुए हैं।

 

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