इरफ़ान का खुद का लिखा जिंदगी के लिये उम्मीद भरा अनुभव
जून 2018 में इरफ़ान ने एक ख़त लिखा था … इसे पढिये और महसूस कीजिये , वो भागता – दौड़ता सा आदमी अचानक थम गया था , एक दर्द जिसने उसकी दुनिया बदल दी , उसके सपने तोड़ दिए , उसकी उम्मीदों को छला , पर फिर भी वो दर्द को हराकर उठा , चला और दौड़ने की कोशिश भी की … पर … हम हैं तो आख़िर उसके हाथ की कठपुतली ही ना …
इस बात को काफी समय गुजर चुका है जब मुझे हाई-ग्रेड न्यूरोएंडोक्राइन कैंसर से की जानकारी मिली. यह मेरी वोकेबलरी में एक नया शब्द था. मुझे पता चला कि कि यह एक असाधारण बीमारी है, जिसके मामले कम ही देखने को मिलते हैं. इसलिए इस बारे में कम ही जानकारी है. इसके ट्रीटमेंट में अनिश्चितता की संभावना ज्यादा थी. मैं अब ट्रायल एंड एरर गेम का हिस्सा बन चुका था.
अब तक मैं एक अलग गेम में था. मैं एक तेज रफ्तार ट्रेन में सफर कर रहा था. जहां मेरे सपने थे, प्लान थे, महत्वकांक्षाएं थीं, उद्देश्य था और इन सबमें मैं पूरी तरह से बिजी था… अचानक किसी ने मेरा कंधा थपथपाया, मैंने मुड़कर देखा. यह टीसी था, ‘आपकी मंजिल आने ही वाली है, कृपया उतर जाइए.’ मैं हैरान रह गया और सोच रहा था, ‘नहीं नहीं, मेरी मंजिल अभी नहीं आई है. उसने कहा, नहीं, यही है. जिंदगी कभी-कभी ऐसी ही होती है.’
समय की इस तेजी ने मुझे एहसास कराया कि कैसे आप समंदर के लहरों में तैरते हुए एक छोटे से कॉर्क (बोतल के ढक्कन) की तरह हो! और आप इसे कंट्रोल करने के लिए बेचैन रहते हो.
इस उथल-पुथल, हैरानी, भय और घबराहट में अपने बेटे से कहा, ‘केवल एक ही चीज जो मुझे अपने आप से चाहिए वह यह है कि मैं इस मानसिक स्थिति को हड़बड़ाहट, डर, बदहवासी की हालत में नहीं जीना चाहता. मुझे किसी भी सूरत में मेरे पैर चाहिए, जिन पर खड़ा होकर अपनी हालत को तटस्थ हो कर जी पाऊं. मैं खड़ा होना चाहता हूं.’
मेरी मंशा ये थी और अचानक बहुत दर्द हुआ. ऐसा लगा मानो अब तक तो मैं सिर्फ दर्द को जानने की कोशिश कर रहा था और अब मुझे उसकी असली फितरत और तेजी का पता चला. उस वक्त कुछ काम नहीं कर रहा था, न किसी तरह की सांत्वना, कोई प्रेरणा…कुछ भी नहीं. पूरी कायनात उस वक्त आपको एक सी नजर आती है. सिर्फ दर्द और दर्द का एहसास जो ईश्वर से भी ज्यादा बड़ा लगने लगता है.
जब मैं अस्पताल के अंदर जा रहा था मैं खत्म हो रहा था, कमजोर पड़ रहा था, उदासीन हो चुका था और मुझे इस चीज तक का एहसास नहीं था कि मेरा अस्पताल लॉर्ड्स स्टेडियम के ठीक ऑपोजिट था. बचपन में मेरे सपनों का मक्का. इस दर्द के बीच मैंने विवियन रिचर्डस का पोस्टर देखा. कुछ भी महसूस नहीं हुआ, क्योंकि अब इस दुनिया से मैं साफ अलग था.
अस्पताल में मेरे ठीक ऊपर कोमा वाला वॉर्ड था. एक बार अस्पताल के कमरे की बालकनी में खड़ा था. इस अजीब सी स्थिति ने मुझे झकझोर दिया. जिंदगी और मौत के खेल के बीच बस एक सड़क है, जिसके एक तरफ अस्पताल है और दूसरी तरफ स्टेडियम. न तो अस्पताल किसी निश्चित नतीजे का दावा कर सकता है और न स्टेडियम. इससे मुझे बहुत तकलीफ होती है.
मेरे पास केवल भगवान की शक्ति और समझ बची है. मेरे अस्पताल की लोकेशन भी मुझे प्रभावित करती है. दुनिया में केवल एक चीज निश्चित है और वो है अनिश्चितता. मैं केवल इतना कर सकता हूं कि अपनी पूरी ताकत को महसूस करूं और अपनी लड़ाई पूरी ताकत से लड़ूं.
ये महसूस करने के बाद मैंने नतीजे की चिंता किए बगैर भरोसा करते हुए अपने हथियार डाल दिए हैं. मुझे नहीं पता कि अब 8 महीने या 4 महीने या 2 साल बाद जिंदगी मुझे कहां ले जाएगी. पहली बार मुझे पता चला कि ‘आजादी’ का सही मतलब क्या है. ऐसा लगता है जैसे मैंने पहली बार जिंदगी का स्वाद चखा है. भगवान पर मेरा भरोसा और मजबूत हुआ है.
इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग… सभी, मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम ज़ोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं. मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गयी हैं… एक बड़ी शक्ति… तीव्र जीवन धारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही है.
अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है… मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं. लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नयी दुनिया दिखाती है. एहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो… जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे हों!



