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जंगल में गोबर पर अधिकार की न्याय कथा

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यह एक पुरानी घटना है, लेकिन नए संदर्भ में जानने में दिलचस्प होगी। पिछले कुछ समय से देश गाय, गोबर, गोमूत्र और उसके उलट बीफ को भी लेकर बेहद सक्रिय, वाचाल, दुविधा में तथा परस्पर विरोधी दावों में फंसा रहा है। कोरोना वायरस के आने के बाद भी कुछ सांप्रदायिक नस्ल के चिकित्सक गोमूत्र और गोबर के जरिए कोरोना को तथाकथित स्वदेशी चिकित्सा के जरिए खत्म करने का दावा करने आए थे। लेकिन बाद में दुम दबाकर भाग गए।

मध्यप्रदेश में वन क्षेत्र के अंदर के गांवों में निवास करने वाले आदिवासी और दूसरे किसान अपने पशुओं का लालनपालन अपनी जीविका के लिए करते थे। अलग लाइसेंस लेकर वन क्षेत्र में पशुओं को चराने ले जाते थे और उनका गोबर इकट्ठा कर खाद वगैरह बनाने के लिए ले आते थे। लाइसेंस के लिए मामूली फीस भी सरकार को दी जाती थी। खरगोन में आए एक नए कलेक्टर और वन मण्डल अधिकारी को सरकार को अमीर बनाने का एक नायाब आइडिया आया। उन्होंने कहा कि जो मवेशी वन क्षेत्र में चरने के कारण वहीं गोबर कर देते हैं वह भारतीय वन अधिनियम की परिभाषा के तहत वन उत्पाद है। उसे किसान नहीं ले जा सकते। अन्यथा वे मुनासिब भुगतान करें। मजबूर होकर किसानों को हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

हाईकोर्ट ने पाया कि वन अधिनियम के तहत पशु की परिभाषा में हाथी, ऊंट, भैंस, घोड़े, घोड़ियां, खस्सी, टट्टू, बछड़े, बछेड़ियां, खच्चर, गधे, सुअर, भेड़ें, भेड़ियां, मेमने, बकरियां और बकरियों के मेमने हैं। सरकारी अफसरों का तर्क था कि गोबर इसलिए वन उपज है क्योंकि परिभाषा के अनुसार वन पशु, पशुओं की खालें, हाथी दांत, सींग, हड््िडयां, रेशम, रेशम के कोए, शहद और मोम तथा पशुओं के सब अन्य भाग एवं उत्पादन होता है। मजेदार बात यह भी रही कि सरकार ने कहा कि परिभाषा के अनुसार पीट चट्टान और खनिज जिसमें चूना पत्थर, लाल मुरम, खनिज तेल और खानों तथा खदानों से प्राप्त तेलीय पदार्थ सम्मिलित हैं के अनुसार भी गोबर सतही मिट्टी का अंश है। इस मनोरंजक तर्क की बखिया उधेड़ते हाईकोर्ट ने कहा कि पालतू पशु जंगल में चराई के लिए लाइसेंस के आधार पर ले जाए जाते रहे हैं। वन उत्पाद का आशय होता है कि जो वस्तुएं या पशु जंगल के जीवन में कुदरती तौर पर उत्पन्न होते रहते हैं। ये गाय भैंस वगैरह जंगल का कुदरती उत्पाद नहीं हैं। वे लाइसेंस फीस देकर जंगल में केवल चरने के उद्देश्य से ले जाए जाते रहे हैं। इसलिए उनकी देह से उत्पाद याने गोबर सतही मिट्टी का अनिवार्य घटक नहीं है। गोबर पर किसानों का हक है। उसे वन उत्पाद नहीं कहा जा सकता। लाइसेंस फीस का मतलब ही है कि किसानों के उपरोक्त पशु जंगल क्षेत्र में चराई के नाम पर विचरण भर करने जा सकते रहे हैं। वे जंगल के जीवन का हिस्स्सा न तो हो सकते हैं और न कहे जा सकते हैं।

नौकरशाही ऐसे ही कई मूर्खतापूर्ण और मनोरंजक फैसले करती रहती है। उसके कारण जनता को अनावश्यक रूप से बहुत खर्च कर अदालतों में मुकदमे लड़ने पड़ते हैं। लेकिन इससे अफसरों के तेवर, तैश और तासीर में कोई फर्क नहीं पड़ता। अदालतें यदि ऐसे तुगलकी नस्ल के अधिकारियों पर आर्थिक दंड आरोपित करें तो उनका अफसरी विवेक जनता को तंग करने से बाज तो आए। देश की हालत लेकिन यह है कि अदालतों में सुप्रीम न्याय नहीं मिल रहा है। बल्कि वहां सुप्रीम नस्ल के सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों को न्याय मिलने की लगातार गारंटियां हैं। न्याय तो दरअसल कुदरती उत्पाद है। उसे सरकारी जंगलों के नियमों का उत्पाद बना दिया जा रहा है। जिस जनता को लायसेंस और टैक्स देकर भी सरकार नामक जंगल चुनने की मजबूरी हो। वह न्याय का गोबर तक पाने में कुछ नहीं कर पा रही है।
(कनक तिवारी)

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