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अमेरिका और कोराना महामारी- दिगम्बर सिंह

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कोराना महामारी ने पूरी दुनियां को अपनी चपेट में ले लिया है। साधन सम्पन्न विकसित देशों में महामारी ने विकराल रूप धारण कर लिया है। अमेरिका में यह मारामारी सबसे ज्यादा हाहाकार मचा रही है। अकेले अमेरिका में एक लाख से अधिक लोग अपनी जान गवां चुके हैं। भारत में जैसे जैसे जांच की संख्या बढ रही है। कोराॅना केशों की संख्या तेजी से बढ रही है। भारत कोराॅना संक्रमितों के मामले में 8 वें नम्बर पर पहुॅंच गया है। जुलाई तक अमेरिका के बाद भारत में काॅरोना संक्रमितों की संख्या दूसरे नम्बर पर पहुॅच जायेगी। भारत में लाॅक डाउन व काॅरोना रोकथाम की सारी व्यवस्थाऐं फेल हो गई हैं। जनता की जान सांसत मे है। बेसब्री से टीके व दवाओं का इंतजार कर रहे हैं। टीका व दवाऐं खोजे जाने पर ही कोरोना पर काबू पाया जा सकता है। विभिन्न देशों मेें वैज्ञानिकों की 100 से अधिक टीमें काॅरोना के टीके की खोज में लगे हैं। जिनमें से कुछ जगह टीकों का क्लीनिक ट्रायल दूसरे, तीसरे व चैथे चरण में है। इस सबके बाबजूद वैज्ञानिक साल के अंत तक टीके के बाजार में आने की सम्भावना जता रहे हैं। उस समय तक भारत में 5 करोड से अधिक लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो जाने की संभावनाऐं व्यक्त की जा रही है। उस समय सबसे अधिक कोराना मरीजों वाला देश बन चुका होगा।

कोरोना का टीका (वेक्सीन) व दवाऐं विकसित होने से पहले ही अमेरिका टीका व दवाओं पर एकाधिकार (कब्जा) कर लेना चाहता है। अमरिका की लैब में कोरोना की वेक्सीन खोज ली जाती है तो पेटेन्ट कराकर अमेरिका की कम्पनी उसका मालिक बन जायेगी। और यदि किसी अन्य देश की लैब में वेक्सीन पहले तैयार हो जाती है तो भारी पैसा खर्च करके व दाब धौंस के जरिए अमेरिका उस वेक्सीन का पेटेन्ट अपने देश की कम्पनी के नाम कराना चाहता है। अमेरिका सभी देशों तक टीका व दवाओं की पहुॅंच को सीमित कर देना चाहता है। ऐसी इसलिए ताकि अमेरिका की कम्पनी को कोरोना के टीके व दवाओं पर कब्जा मिल जाये। पेटेन्ट लाइसेन्स के नाम पर अन्य देशों की कम्पनियां उस वेक्सीन व दवा को नहीं बना सकें। और बीमारी से भी मुनाफे कमाने की हबस वाली अमरिका की कम्पनी कोरोना की वेक्सीन को मनमाने मंहगे दाम पर बेच सकें।

कोरोना महामारी के समय अमेरिका की योजना में विश्व स्वास्थ्य संगठन और चीन बाधक हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन अपनी मीटिंगों में कोरोना की वेक्सीन को पेटेन्ट से मुक्त रखने का प्रस्ताव रख चुका है। प्रसताव के अनुसार किसी भी देश की लैब में वैक्सीन तैयार होती है तो वह सभी देशों को उपलब्ध होगी। उस पर प्रोफिट व रायलटी नहीं होगी। चीन ने ये प्रस्ताव रखा था। सभी देश विश्व स्वास्थ्य संगठन के इस प्रस्ताव के समर्थन में हैं। विश्व बैंक की मीटिंगों में अमेरिका ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की फण्डिंग रोककर वेक्सीन की खोज को प्रभावित किया। अमेरिका ने पिछले साल का विश्व स्वास्थ्य संगठन का फण्ड का अपना हिस्सा नहीं दिया। अपनी बात मनवाने के लिए अमेरिका ने दाब धौंस का सहारा लिया। सभी हथकण्डे आजमाए। पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन को बदनाम किया। विश्व स्वास्थ्य संगठन पर चीन समर्थक होने का आरोप लगाया। विश्व स्वास्थ्य संगठन को कमजोर करने के लिए संकट की घडी में विश्व स्वास्थ्य संगठन से अपने को अलग कर लिया है। अमेरिका का यह कदम दुनियां की जनता के प्रति अमानवीय अपराध है। अमेरिका ने दुनियां को ठेंगा दिखाते हुए ऐसा ही अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संधियों व संस्थाओं को छोड दिया है। अमेरिका किसी नियम कायदे कानून को नहीं मानता। वह सिर्फ अपने मुनाफे देखता है। दुनियां में अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता है।

अमेरिका की इस मुनाफे कमाने व दुनियां पर वर्चस्व बनाये रखने की नीति की कीमत केबल दुनियां के देश व जनगण ही नहीं बलिक अमेरिका के गरीब व मेहनतकश भी शिकार होते हैं। Corona के मरीजों मे मरने वाले अधिकतर गरीब, प्रवासी मजदूरों की संख्या अधिक है। जो अमेरिका की महंगी दवाएं व महंगा इलाज वहन नहीं कर सकते।

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