Home छत्तीसगढ़ जीत को तरसते रहे अजीत जोगी : नथमल शर्मा

जीत को तरसते रहे अजीत जोगी : नथमल शर्मा

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file photo

अपना सफ़र पूरा कर चले गए अजीत प्रमोद कुमार जोगी । मंज़िल तक पहुंच कर बार-बार बटोही बनते अजीत जोगी का सफ़र शानदार रहा पर अधूरा ही तो रहा । लोगों के दिलों में राज करने वाले जोगी लेकिन राज कर ही नहीं सके । फ़िर भी सत्ता से उनका गहरा सबंध रहा । तीन बरस तक अपने (जो कांग्रेस का था) राज के बाद भारतीय जनता पार्टी का राज आया पर जोगी हाशिए पर नहीं गए । राजनीति के इस कुशल खिलाड़ी को खेलना आता था । खेलते रहे । कांग्रेस सत्ता में आने से चूकते रही । फ़िर काग्रेस ने उन्हें पार्टी से बाहर किया और सत्ता के गलियारों में पहुंच गई । मतलब यह कि छत्तीसगढ़ की राजनीति अजीत जोगी के आसपास घूमते तो रही ।

यह सब कुछ छुपी बात भी नहीं । लोगों की ज़बान पर है । आज जब वे राजधानी से निर्जीव लौट कर जोगीसार में माटी में विलीन हो रहे हैं तब ऐसे अनेक किस्से लोगों के बीच हो ही रहे हैं । अजीत जोगी ने खुद को रचा था । एक गांव से निकला युवा । उस गांव में बिज़ली नहीं थी पर अजीत जोगी ने तय कर लिया था कि जिंदगी में रोशनी भरना है । आईपीएस और फ़िर आईएएस करके इस युवा ने बता दिया कि अमरकंटक के किनारे की उस माटी में कुछ तो है । एमएसीटी भोपाल का इंजीनियरिंग में गोल्ड मेडल का उनका रिकार्ड आज तक कोई तोड़ नहीं पाया है । रायपुर और इंदौर जैसे शहर की कलेक्टरी जैसी जोगी ने की वह भी एक मिसाल ही है । इस महत्वाकांक्षी युवा को बेचैनी थी । कलेक्टर होना पर्याप्त नहीं लगा । वहां से राज्य सभा में जाने का निर्णय लेना भी कोई सरल नहीं था । आईएएस का ठाठ और निश्चिंतता तो उधर राजनीति का बियाबां जंगल, जहां सब कुछ अनिश्चित और भरोसा नाम की तो चीज़ ही नहीं । ऐसे में अजीत प्रमोद कुमार जोगी ने राजनीति को चुना । फ़िर तो अजीत जोगी ने बहुत तेज़ी से सफ़र किया । लगता है कि कलेक्टरी करते हुए ही उन्होने इसके बीज बो दिए थे । न केवल बोए बल्कि कई तरह की नोट शीट्स, फाइलों की खाद भी देते रहे । अफ़सर से नेता बनने के बाद उनकी वह फ़सल भी बहुत काम आई । दुःखद यह रहा कि इस फ़सल के फूल, फलों के पेड़ तो उनके काम नहीं आए ।

खरपतवार बची रही और उसे ही फलदार बना दिया । यह अजीत जोगी ही कर सकते थे, किया । ठेठ छत्तीसगढ़िया बन कर राजनीति करते रहे । प्रदेश नया बना । सबको पीछे छोड़ मुख्यमंत्री बने । प्रदेश में उस समय कांग्रेस का बहुमत था और इसमें अजीत जोगी की कोई भूमिका नहीं थी । तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्लेट में परोस कर बहुमत दिया छत्तीसगढ़ को और सोनिया गांधी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी अजीत जोगी को । मुख्यमंत्री बनते ही बहुत तेजी से चल पड़े वे ।उसी रात मप्र विद्युत मंडल से खुद को अलग कर छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल बना लिया । अगर मुझे ठीक से याद है तो उस समय करीब 167 करोड़ रुपए मंडल के खाते में आ गए । प्रशासन पर पकड़ । अफसरों पर ख़ौफ । विरोधियों को हर तरह से पटकनी देना । नंदकुमार साय आज भी अपने पैरों को देखते हैं । नेता बन गए अजीत जोगी को बहुत जल्दी भी थी । वे बहुत कुछ कर लेना चाहते थे । मिलने- जुलने पर कहते भी थे । कहते तो फासीवाद और साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ भी थे । इस कहने में अक्सर वैचारिकी से परे अहंकार होता । अजीत जोगी सब कर सकता है का भाव लिए वे कब खुद से ही दूर होते गए शायद उन्हे ही भान नहीं हुआ । खुद का कद सबसे बड़ा करने की अजीब सी लालसा में सबको बहुत बौना समझने लगे । एक दिन सीएम हाऊस में एक कद्दावर मंत्री के गाल पर पड़े चांटे की गूंज ने जैसे छत्तीसगढ़ की राजनीति को अलग दिशा दे दी । दुनिया जीत लेने वाला व्यक्ति अक्सर घर में हार जाता है ।

महाभारत की कथ अभी अभी छोटे परदे पर दोहराई गई । हजार हाथियों के बल वाले धृतराष्ट्र को पुत्र मोह ने ऐसा जकड़ा कि हस्तिनापुर खत्म हो गया । अजीत जोगी अपना इंद्रप्रस्थ रचना चाहते थे । इस प्रदेश के सबसे लोकप्रिय नेता को लेकिन छत्तीसगढ़ ने उन्हें फिर अपना छत्तीसगढ़ कभी नहीं दिया । वे एक प्रकार से मोह ,अहंकार और अपने ही निर्णय के कैदी होकर रह गए । अपने आखिरी 19 दिनों में अचेतन में ही सही उन्हें वह सब बहुत याद आया ही होगा । इस प्रदेश के गरीब ने उन्हें सर आंखों पर बिठाया क्योंकि वे उनका भला चाहते थे ।बड़े कहलाने वाले लोग उनसे भय खाने लगे । गरीब की इस भलाई के लिए चाहे,अनचाहे वे लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी करने लगे । खास कर राजनीतिक मूल्यों की । उनके जैसा छत्तीसगढिया वक्ता अपने प्रदेश में नहीं हुआ । वोट भले ही नहीं मिले पर सबसे ज्यादा भीड़ तो अजीत जोगी की सभाओं में ही आती । इस बारीक अंतर को वे समझ नहीं पाए , अन्यथा अपार जनसमूह को वोट में बदल लेते । मैं नहीं तो तुम भी नहीं वाले भाव के साथ कांग्रेसी नेताओं की किसी सूची को कभी पढ़ा तक नहीं और भाजपा अपनी सूची को बढ़ाते रही ।

विद्याचरण शुक्ल निश्चित रूप से अजीत जोगी से बहुत बड़े नेता रहे । कांग्रेस छोड़ने के बादअपने दम पर चुनाव लड़वाए पर सिर्फ़ दो विधायक जिता पाए । अजीत जोगी ने अपनी पार्टी बनाई उन्हें सिर्फ़ दो साल का ही समय मिला । जोगी या जनता कांग्रेस से पांच विधायक जीते । यह 90 विधायकों वाले छत्तीसगढ़ में बहुत बड़ी बात है । आरक्षित वर्ग से होने के बावजूद उन्होंने कभी इसका लाभ नहीं लिया । राजनीति में भी वे सामान्य सीट से लड़ना चाहते थे । बरसों पहले वे लोक सभा चुनाव बिलासपुर से लड़ना चाहते थे ।छत्तीसगढ़ बनने से पहले की बात है ये ।उन दिनों के जोगी मुझे सचमुच बहुत प्रिय थे । यहां इस बारे में बात या सलाह हुई । संभाग में यही एक सामान्य सीट थी । इस नाते भी मुझे उचित नहीं लगा । मेरी इस सलाह को उन्होंने कड़वाहट के साथ ही लिया क्योंकि यहां के सिर्फ दो लोगों ने उनके फैसले को ठीक नहीं माना । हालांकि इसके बाद उन्होने फ़िर कभी मुझसे कोई राजनीतिक सलाह नहीं ली पर चुनाव यहां से नहीं लड़े । शहडोल चले गए। रायगढ़ भी । शायद ये फांस थी उनके मन में और बरसों बाद अपनी पत्नी को बिलासपुर से टिकट दिलाई । एक विदुशी और अत्यंत विनम्र, व्यवहार कुशल डाॅ रेणु जोगी पर चुनाव हार गई ।

आज जब पूरे प्रदेश में तीन दिन का राजकीय शोक है । अजीत जोगी की बात फिज़ाओं में है । वैसे वे अपना इंद्रप्रस्थ भले ही न रच पाए पर चर्चा से बाहर कभी नहीं रहे । छत्तीसगढ़ की राजनैतिक चर्चा अजीत जोगी के बिना पूरी नहीं होती । अपार लोकप्रियता को सम्हाल पाते । विद्वान बेटे की सलाह को राजनीतिक बेटे की सलाह में बदल पाते तो शायद खुद पर अहम को हावी होने से रोक सकते थे । फ़िर भी आज जिस मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्हें पार्टी से निकाला था ।जो एक दूसरे को देखने तक से बचने लगे थे वे ही आज तीन दिन का का राजकीय शोक घोषित करते हैं । कुछ तो बात थी ही न जोगी में ।अमेरीकी दूतावास से संवेदना पत्र आया है । कितने इसके हकदार हैं ? “उसके दुश्मन थे बहुत वो आदमी भला होगा” काश वे सारे दुश्मनों के बावजूद खुद को उतना भला कहलवा पाते।बहुत कुछ रहा जोगी में । आज न वो सब कहने का अवसर है और न ही स्थान । राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता । कभी शुक्ल बंधुओं का डंका बजता था तो कभी मोतीलाल वोरा की बात कोई काट नहीं सकता था । कभी (अभी- अभी तक ) रमन सिंह का नाम चलते रहा ।लेकिन सर्वाधिक लोकप्रियता के बावजूद ब्रजमोहन अग्रवाल अपनी राजनीतिक लकीर बड़ी नहीं कर सके । यह निष्ठुर राजनीति है । हां, जोगीसार गांव की माटी में विलीन होते समय यह तो साफ़ दिख रहा है कि जोगी युग खत्म हो गया । अजीत जोगी कबीर की राह को मानते रहे और उसी तर्ज़ पर उन्होंने धर दीनी अपनी चदरिया । बहुत याद आएंगे अफ़सर, नेता, साहित्यकार अजीत प्रमोद कुमार जोगी ।

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