आज की तारीख में कुल 321 वैक्सीन निर्माणाधीन हैं जिनमें 32 क्लीनिकल ट्रायल के विभिन्न चरणों में आ गयी हैं। वैक्सीन निर्मात्री कम्पनियों में जबर्दस्त होड़ चल रही है। सबसे प्रसन्नता की बात है कि भारत वैक्सीन निर्माण के मामले में किसी से पीछे नहीं है। यह इस मामले में खुद आत्मनिर्भर तो है ही दुनिया के अनेक गरीब देशों तक वैक्सीन वितरण के लिए कटिबद्ध है। हलांकि एक सौ तीस करोड़ की जनसंख्या में पंक्ति के आखिरी व्यक्ति तक वैक्सीन पहुंचाना एक बहुत बड़ी चुनौती है।
भारत की ड्रग कंपनियां वितरण के लिये वैक्सीन के औद्योगिक उत्पादन के मामले में दुनिया की सिरमौर हैं।अकेले सीरम इन्स्टीच्यूट आफ इन्डिया, पुने वैक्सीन निर्माण की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है। बिना भारत के मदद के दुनिया के कोने कोने तक वैक्सीन नहीं पहुंच पायेगी। सीरम इन्स्टीच्यूट आफ इन्डिया पुणे का ऐग्रीमेन्ट आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और अस्ट्राजेनेका कंपनी के बीच उनके संयुक्त प्रयास से बन रही और तीसरे चरण की वैक्सीन के एक अरब डोज के उत्पादन को लेकर है। इसका क्लीनिकल ट्रायल ब्राजील, यूके और अमेरिका में चल रहा है।
जैसे ही इस तीसरे चरण के ट्रायल के सफल होने की घोषणा होती है सीरम इंस्टीट्यूट वैक्सीन तत्काल मुहैया करा देगा। सारी तैयारियाँ पूरी हैं। भारतसरकार आधी संख्या में वैक्सीन रोककर बाकी गरीब देशों में वितरण हेतु मुक्त कर देगी। कंपनी ने अभी तक वैक्सीन निर्माण को लेकर ग्यारह अरब रुपये (यूएस 200मिलियन डालर) दांव पर लगा दिया है। इसकी क्षमता छह करोड़ से सात करोड़ वैक्सीन डोज निर्माण प्रति माह की है। कंपनी की व्यावसायिक स्तर पर वार्ता मैरीलैंड की नोवामैक्स कंपनी और न्यूयार्क की कोडाजेनिक्स कंपनी से भी चल रही है। अगर आक्सफोर्ड वैक्सीन सफल नहीं हुई तो इनकी वैक्सीन उत्पादित होगी।
भारत में ही हैदराबाद स्थित ड्रग फर्म बायोलाजिकल्स ई ने बेल्जियम के जान्सेन फार्म्युस्टिकल्स से अनुबंध किया है। जिसकी वैक्सीन भी क्लीनिकल ट्रायल में है। इसका नाता ह्यूस्टन, टेक्सास के बेलर कालेज आफ मेडिसिन से भी है जो वैक्सीन ट्रायल में जुटी हुई है। हैदराबाद की ही इन्डियन इम्यूनोलाजिकल्स आस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ युनिवर्सिटी के वैक्सीन निर्माण को लेकर सक्रिय है। इसके अलावा दो और भारतीय कंपनियां भारत बायोटेक जाईडस कैडिला (अहमदाबाद) उन वैक्सीन पर नजर रखे हुये हैं जो ट्रायल के पहले दूसरे चरण में हैं।
सबसे बड़ी चुनौती वैक्सीन के वितरण को लेकर है। मगर भारतीय निर्वाचन आयोग के एक माडल से आशायें जगी हैं। भारत में आयोग ने ऐसी व्यवस्था पहले से ही कर रखी है कि किसी भी मतदाता को वोट देने के लिये एक किलोमीटर या अधिकतम दो किमी से दूर न जाना पड़े। यह पूरा नेटवर्क हमारे पास मौजूद है। बस इसी को अपना कर हर मतदान केंद्र पर वैक्सीन दिवसों का आयोजन कर जनपदीय प्रशासनिक मशीनरी से वैक्सीन लगाने का काम पूरा किया जा सकता है। अन्यथा यह एक वर्षों में खत्म होने वाला काम बन जायेगा। जैसे साढ़े चालीस करोड़ बच्चों को मीजेल्स – रुबेला वैक्सीन देने में 2017 से तीन वर्ष लग गये थे।
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने आक्सफोर्ड वैक्सीन का दाम भी तय कर दिया है – मात्र दो सौ पच्चीस रुपये। संभव है सरकार गरीब समुदायों के लिये वैक्सीन अनुदान भी जारी करे।
(भारत और कोविड19)
साभार डॉ अरविन्द मिश्रा


