लोक का तंत्र आखिर कब आएगा देश में?
( शेखर नाग )
सात चरणों के लंबे चुनावी प्रक्रिया का दो दिनों में समापन हो जायेगा और साफ़ हो जायेगा कि किसकी सरकार बनेगी। हर धड़ा दावा कर रहा है कि उसकी सरकार बनेगी। दावों के अपने-अपने तर्क हैं । एक तरफ एनडीए द्वारा 400 पार का दावा है तो इंडिया गठबंधन का 295 सीटें जीत कर बहुमत हासिल करने का । अंतिम चरण के चुनाव होने बाद सभी न्यूज़ चैनल अपने-अपने एग्जिट पोल को सबसे सटीक साबित करने में जी जान से जुट गये हैं । दो दिनों में इनके दावों की सच्चाई सामने आ जायेगी और फिर नई सरकार का गठन भी हो ही जायेगा । अब सवाल उठता है कि नई सरकार किसकी बनेगी। एनडीए की या इंडिया की ? लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल है जनता की सरकार कब बनेगी ? भारतीय जनतंत्र में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार काँग्रेस-भाजपा या उनके धन्नासेठों की सरकार बन जाती है। क्या यह लोकतंत्र की अब व्यवहारिक समस्या है ?
इस पर बहुत गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है । यह लोकतंत्र के लिए बड़ी चुनौती है । जनता द्वारा चुनी हुई सरकार किसी दल विशेष की सरकार क्यों बन जाती है ? जनहित में काम करने की बजाय दल विशेष और पूंजीपतियों के लिए क्यों काम करती है ? क्योंकि चुनाव में जमके बाहुबल और धनबल का इस्तेमाल होता है। निर्वाचन आयोग भी इसे रोकने में असहाय दिखाई पड़ता है । नतीजा यह होता है कि राजनैतिक दल क़दम-क़दम पर अपने एजेंटों के ज़रिये मतदाताओ को पूरी तरह प्रभावित करते हैं। उनके एजेंट गली मोहल्लों तक में जमे हुये हैं । वो मतदाताओ से चुनाव के समय ही नहीं पूरे पांच वर्षों तक लगातार संपर्क में रहते हैं और छोटे-छोटे कामों के लिए भी जनता को आश्रित बना देते हैं और ग़रीब लोगों से दलाली भी खाते हैं । अशिक्षा और भ्रष्टाचार इसमे आग का काम करते हैं । लगातार ऐसे धार्मिक आयोजन किये जाते हैं जिससे मतदाता भ्रमित हो जाता है । इन आयोजनों से मतदाताओं के दिलो दिमाग़ में चालाकी से इस बात को बार-बार ठूँसा जाता है कि वो चाहकर भी इस सिस्टम को न चुनौती देने के क़ाबिल हैं न बदलने के । उन्हें इस सिस्टम को अपनाना ही पड़ेगा और इसके नियम (कमीशन) का पालन करने के सिवाय उसके पास कोई और चारा नहीं है । इस तरह मतदाताओं को जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्रीयता इत्यादि में उलझा दिया जाता है । यह उलझन बहुत सुनियोजित तरीके से पैदा की जाती है । रोटी, रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दे कहीं दूर छूट जाते हैं। इस तरह दल विशेष की सरकार बनने की सभी रुकावटें दूर हो जाती है और जनता की सरकार का सपना अधूरा ही रह जाता है ।
दल विशेष की सरकार बनने के कुछ ही दिनों के बाद ही जनता को यक़ीन दिलाने के लिए कि वह जनता की सरकार है, अपने प्रचार में भारी जन धन का इस्तेमाल किया जाता है । दिन रात सरकारी भोंपू बजते रहते हैं। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद जनता की सरकार होने का उनका ढ़ोंग नाकाम साबित हो जाता है । क्योंकि ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही होती है। उनके प्रचार और कर्म में बहुत विरोधाभास होता है । सरकारें एक तरफ़ दावा करती है कि अमुक वर्षों में लाखों लोगों को ग़रीबी रेखा से ऊपर पहुंचाया गया है और दूसरी तरफ़ मुफ़्त राशन लाखों से ज़्यादा करोड़ो लोगों को देने का ज़ोर ज़ोर से ढिंढ़ोरा पीटती है । अगर सरकार ने लाखों लोगों को ग़रीबी रेखा से ऊपर पहुंचाया तो फिर करोड़ो लोगों को मुफ़्त राशन देने की ज़रूरत क्यों पड़ी ? इस तरह सरकार के दावों की पोल ख़ुद-ब-ख़ुद खुल जाती है । सरकार कई और भी दावा करती है शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार इत्यादि मुद्दों पर। आंकड़ों की बाज़ीगरी सदा जारी रहती है । इन दावों की सटीकता से पड़ताल करें तो खोखले साबित होते हैं । रोज़गार की बात करें तो आज़ादी के बाद से अब तक सरकारों ने इस मुद्दे पर ठीक से काम ही नहीं किया है । उनके सारे दावे महज़ किताबी हैं । देश मे लगातार बेरोज़गारों की संख्या बढ़ते ही जा रही है । बेरोज़गारों हेतु बनाये गये रोज़गार कार्यालय सिर्फ़ संस्थान बन के रह गये हैं । अब इन संस्थानों से बेरोज़गारों का भरोसा उठ चुका है। पहले कभी कभार इन कार्यलयों के माध्यम से थोड़ा बहुत बेरोज़गारी भत्ता मिल जाता था । लेकिन अब वह भी बन्द हो गया है । योग्यता के अनुसार काम न दे पाना क्या रोज़गार माना जायेगा ? किसी व्यक्ति ने अगर उच्चशिक्षा प्राप्त किया है तो क्या चतुर्थ श्रेणी की नॉकरी से उसके साथ न्याय हो पायेगा ? उसकी योग्यतानुसार ही नियुक्ति देना सही रोज़गार माना जायेगा। उसे जिस पद पर नियुक्ति दी गई है उस पद पर श्रम क़ानून भी अनिवार्यतः लागू होना चाहिए । श्रम कानून के मुताबिक वेतन के बिना रोज़गार का दावा करना सिर्फ़ बेमानी है और यह बेमानी सरकारी और प्राइवेट संस्थानों में धड़ल्ले से जारी है। संविदा और आउटसोर्सिंग तो शोषण की खुली छूट है । इसमे श्रम कानून और दूसरी किसी सुरक्षा का सवाल ही नहीं है । समान काम समान वेतन भी नहीं है । असंगठित क्षेत्रों में तो स्थिति और भी भयानक है । वहां तो बाल श्रमिकों से भी काम करवाया जाता है । इन क्षेत्रों में अगर कोई काम के लिए जाता है । मालिक या ठेकेदार का जबाब होता है पहले काम देखेंगे फिर वेतन बताएंगे। महीने भर काम करते हुऐ अगर श्रमिक को काम नहीं जमा या महीना पूरा होने के पहले अगर वह काम छोड़ देता है तो उसके वेतन का कोई माई बाप नहीं । इस तरह मालिक उसके श्रम का लूट करता है । अधिकाँश जगह महीना पूरा होने के हफ़्ते दस दिन बाद वेतन दिया जाता है । श्रमिक इसे कई बार स्वाभाविक मान लेता है । यह स्वाभाविक नहीं षड्यंत्र और अन्याय है । वेतन मिलने के बाद कोई श्रमिक काम छोड़ता है तो उसके हफ़्ते दस दिन के वेतन का कोई हिसाब नहीं। सेठ पगार रोक लेता है । सेठों को पगार रोकने का संरक्षण सरकारें प्रदान करती है । बदले में सेठ सरकारों यानी राजनैतिक दलों को चंदा दिया करते है । कुछ दिनों पहले चंदा वसूली का कारपोरेट और कंपनियों से बड़े पैमाने पर लिए जाने का इलेक्ट्रो बांड का षडयंत्र सुप्रीम कोर्ट के फटकार के बाद बेनक़ाब हुआ था। पूंजीपतियों का राजनैतिक दलों को चंदा दान महादान जनतंत्र के लिए बहुत ख़तरनाक है। ये रोज़गार के लिए भी बहुत ख़तरनाक है। रोज़गार मानव विकास सूचकांक में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है । रोज़गार में श्रम कानून के पालन के बग़ैर रोज़गार पूर्ण नहीं माना जायेगा। सरकारें ऋण देने को भी रोज़गार मानती है जो हास्यास्पद है । रोज़गार व्यक्ति के रहन-सहन, शिक्षा और स्वास्थ्य में भी बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है । इसके असर को कुछ इस तरह समझा जा सकता है । व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए संतुलित भोजन की ज़रूरत होती है । व्यक्ति संतुलित भोजन तभी प्राप्त कर सकता है जब उसके मेहनत का उसे उचित दाम मिले । उचित मजदूरी से ही वह संतुलित भोजन ग्रहण कर पायेगा । संतुलित भोजन से ही व्यक्ति स्वस्थ रह सकता है। अब बात आती है संतुलित भोजन किसे कहते हैं – भोजन के छह आवश्यक घटक कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, खनिज-लवण, विटामिन और पानी जिस भोजन में उचित मात्रा में हों उस भोजन को संतुलित भोजन कहते हैं । सन्तुलित भोजन का प्रमुख घटक प्रोटीन का प्रमुख स्रोत दाल है । दाल वही खा सकता है जिसकी आमदनी ठीक ठाक हो यानी उसके मेहनत का सही मोल मिले। कम आमदनी वाला व्यक्ति दाल नहीं खा पायेगा । दाल नहीं खा पायेगा तो प्रोटीन से वंचित रह जायेगा और प्रोटीन की कमी से उसका शरीर बीमार हो जाएगा है । वर्तमान में दाल की कीमत आसमान छू रही है और अधिकांश निम्न माध्यम वर्ग के लोग दाल खाने से वंचित कर दिये गये हैं । तो उनमें शारीरिक अक्षमता आना अवश्यंभावी है। यानी महंगाई आम आदमी पर बहुत बड़ा हमला है और सरकार महंगाई नियंत्रण न कर आम लोगों का बहुत नुकसान करती है । महंगाई और दूसरे ज़रूरी मुद्दे पर लोगों का एकजुट नहीं होना समाज के लिए बहुत बड़ा संकट है।
अब एक बार फिर बात करते हैं लंबे चुनावी चरणों की। आज के कंप्यूटरीकृत युग में चुनाव का इतने लंबे चरणों मे संपन्न होना समझ से परे है । लगता है सत्ता पक्ष चाहता रहा हो कि शुरुवात के कुछ चुनावी चरणों के संकेत को समझकर अंतिम चरणों की रणनीति बनायी जायेगी। चुनाव के समय देश मे आईपीएल का समांतर आयोजन भी लंबे चुनावी चरण का कारण हो सकता है । इससे इस बात का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि हमारे देश मे कॉरपोरेट का कितना दख़ल है । आईपीएल में भारी प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल होता है । आईपीएल से होने वाली आय किसके खाते में जाती है, सरकार या कॉरपोरेट के ? इस आय का इस्तेमाल क्या देश के विकास में होता है ? आईपीएल में खिलाड़ियों को एक गेंद फेंकने और एक रन बनाने के लाखों रुपये मिलते हैं । जहाँ एक ओर खिलाड़ी हज़ारों रूपये लीटर के विदेशों से आयातित मिनरल वाटर पीते हैं तो देश मे भीषण गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए सिरफुटौव्वल और रतजगा है। कुछ वर्ष पहले एक विदेशी क्रिकेट खिलाड़ी बीच मे आईपीएल छोड़कर अपना देश रवाना हो गया था । उसका कहना था कि देश मे लोगों को अस्पतालों की ज़्यादा ज़रूरत है । इन समस्याओं को दूर करने के बजाय इस तरह के आयोजनों में करोड़ो रूपये ख़र्च किये जा रहे हैं । विदेशियों को हमारे देश की समस्याएं दिख रही है लेकिन हमारे देश के ज़िम्मेदार लोगों को ये समस्याएं दिखायी क्यों नहीं देती या जानबूझकर अनदेखा करते हैं । यह लोग चाहे अनदेखा करें । लेकिन जनता को अपनी मूल समस्या पर ध्यान देना ही होगा वरना उसके दुःख दूर नहीं होंगे । जनता को जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्रीयता जैसे भावनात्मक मुद्दों से ऊपर उठकर रोटी, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर वोट करना होगा। किसी की भी सरकार बने जनता को बुनियादी समस्याओं पर सरकार से सवाल करना होगा । लगातार जनसंघर्ष ज़रूरी है । तभी सरकार जनता की बन पायेगी और जनता को बुनियादी समस्याओं से मुक्ति मिल पायेगी ।
लेकिन जनता शायद अपने दम पर भावनात्मक मुद्दों से बाहर नहीं आ पायेगी । क्योंकि वैज्ञानिक पद्धति से जन शिक्षण के सारे रास्ते बंद कर दिये गये हैं और भरमाने के आयोजन सतत जारी है । जन शिक्षण और बदलाव की बात करने वाले लोगों को यह ज़िम्मेदारी निभानी होगी । बुद्धि जीवियो की यह ज़िम्मेदारी है कि जनता से सीधे संवाद स्थापित कर उन्हें बुनियादी मुद्दों की परख करवाये। इन बुद्धिजीवियों को वातानुकूलित आयोजन और सोशल मीडिया के बौद्धिक जुगाली से बाहर निकलकर जनता से सीधे जुड़ना होगा । बकौल अदम गोंडवी चमारों की गलियों में जाना होगा । लेकिन कुछ बुद्धि जीवियो की नाक भौं में सिकुड़न आ जाती है इन गलियों का नाम सुनते ही । ख़ैर आज नहीं तो कल बदलाव आना ही । बकौल जीवन यदु
किला दानवी टूटेगा आज नहीं तो कल
और सरकार जनता की बनेगी।
शेखर नाग
(लेखक सामाजिक आंदोलन और रंगकर्म से जुड़े हैं)



