Home छत्तीसगढ़ नासिर अहमद सिकंदर: युवा कवियों-लेखकों के प्रकाश-स्तंभ

नासिर अहमद सिकंदर: युवा कवियों-लेखकों के प्रकाश-स्तंभ

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छत्तीसगढ़ के नए रचनाकारों को विगत 4 दशक तक मार्गदर्शन देते हुए  प्रोत्साहित करने  वाले  वरिष्ठ कवि स्व नासिर अहमद सिकंदर  का विगत वर्ष  निधन हो गया। वे जनवादी लेखक संघ के एक दशक तक राज्य सचिव रहे।

​(चर्चित कवि रजत कृष्ण और उनके छोटे भाई शैलेश से भास्कर चौधुरी के बागबाहरा प्रवास पर हुई  बातचीत पर आधारित, दो कवियों की तीसरे कवि के बारे में पुराने पत्रों पर आधारित चर्चा)

​17 जून 1994 को रजत के पते पर एक पोस्टकार्ड आया, जिसमें लिखा था — “प्रिय भाई, पहली बार बिना परिचय के पत्र लिख रहा हूँ। यहाँ ‘दैनिक नवभारत’ में ‘अभी बिल्कुल अभी’ स्तंभ का प्रभार मेरे पास है, जो नई प्रतिभाओं के सम्मान और खोज का स्तंभ है। एकांत श्रीवास्तव से बातचीत हुई, तो उनसे आपका पता लिया। कुछ पत्र-पत्रिकाओं में भी आपको पढ़ चुका हूँ। अपनी कम से कम दस कविताएँ, फोटो और संक्षिप्त परिचय जल्द भेज सकें तो अच्छा होगा…”

​इसी वर्ष अगस्त या सितंबर महीने की बात है, जब नासिर अहमद सिकंदर, कवि-आलोचक मित्र बसंत त्रिपाठी के साथ बारिश में भीगते हुए स्कूटर पर सवार होकर दुर्ग से बागबाहरा पहुँच गए। यह रजत से नासिर भाई की पहली मुलाकात थी। उन दिनों छरहरे बदन के नासिर अपनी उम्र से काफी कम और युवा नज़र आते थे। वे लोग बागबाहरा आते समय रास्ता भटक गए थे। इस मुलाकात से पहले नासिर भाई को रजत के बारे में जो कुछ भी जानकारी थी, वह अखबारों और पत्रिकाओं के माध्यम से ही मिली थी।
​रजत याद करते हैं — “मैं नया था, इसलिए शुरुआत में अधिक बात नहीं हो सकी। उन्होंने मुझे पत्र-पत्रिकाओं की समीक्षा करने के लिए ‘नवभारत’ के रविवारीय (साहित्यिक) अंक में ‘पत्रिका जगत’ कॉलम की जिम्मेदारी सौंपी। साथ ही, ‘अभी बिल्कुल अभी’ कॉलम — जिसका संपादन नासिर जी स्वयं करते थे — के लिए कम से कम 10 कविताएँ भेजने की बात जून में लिखे पत्र के बाद दोबारा दोहराई।

दरअसल, ‘अभी बिल्कुल अभी’ की शुरुआत उन्होंने बसंत त्रिपाठी की ‘कालाहांडी’ कविता से की और फिर दूसरे या तीसरे अंक में मेरी कविताएँ और उन पर अपनी टिप्पणी के साथ की थी। इसके बाद भास्कर चौधुरी और कई अन्य युवा कवियों-कवयित्रियों को प्रकाशित करने का यह सिलसिला लंबा चला। नासिर जी का यह कॉलम युवा प्रतिभाओं के लिए एक ऐसा मंच था, जिसका पाठकों और लेखकों को उत्सुकता से इंतजार रहता था कि अगला कवि कौन होगा और इन दिनों किस तरह का लेखन हो रहा है। दैनिक नवभारत के ‘अभी बिल्कुल अभी’ में प्रकाशित होना मेरे लिए एक अलग तरह का आल्हाद तो था ही, साथ ही यह मेरे साहित्यिक जीवन के लिए एक ‘पिकअप’ साबित हुआ। यहीं से मैंने पढ़ने-लिखने और संवाद करने को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया। इसी बीच, वरिष्ठ रचनाकारों के कॉलम के लिए नासिर भाई ने अनेक नामचीन कवियों-लेखकों के साक्षात्कार प्रकाशित किए, जिसने मुझे और मेरे साथियों को बेहद प्रेरित किया।”
​बहरहाल, ‘सम्भवा’, ‘सर्वनाम’, ‘आकंठ’, ‘कृतिओर’, ‘प्रतिश्रुति’, ‘सूत्र’, ‘साक्षात्कार’ और ‘पहल’ जैसी अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के विभिन्न अंकों की समीक्षाएँ रजत कृष्ण इसमें एक कॉलम ‘पत्रिका जगत’ के लिए लिखने लगे। उनके लिखे इन आलेखों के पहले पाठक नासिर अहमद सिकंदर होते थे, जिनसे समय-समय पर सुझाव और प्रशंसा दोनों बराबर मिलती थी। नासिर भैया के माध्यम से छप रहे इस कॉलम को पाठकों का भरपूर प्यार मिला, जो रजत तक चिट्ठियों के रूप में पहुँचता था। यह उनके सीखने, नियमित और बेहतर लिखने की शुरुआत थी, जिसकी प्रेरणा उन्हें वरिष्ठ और समकालीन लेखकों के साथ-साथ मुख्य रूप से नासिर भाई से मिलती थी। कई मौकों पर नासिर भैया स्वयं उनसे पूछते थे कि अगले अंक में किस नए कवि को शामिल किया जाए, तब रजत उन दिनों लिख-पढ़ रहे नए और प्रतिभावान कवियों को खोजने व परखने में उनकी मदद करते थे।
​शैलेश बताते हैं कि नासिर भैया भले ही उम्र में बड़े थे, लेकिन कई अवसरों पर, खासकर विषम परिस्थितियों में वे व्याकुल हो जाते थे और असमय ही फोन लगा लिया करते थे। एक बार उन्होंने रात के लगभग डेढ़ बजे फोन लगाया और पूछा — “रजत, यह जो धान के गुच्छे होते हैं, उनमें कितनी बालियाँ होती हैं? बालियाँ आख़िर निकलती कब हैं और कैसे निकलती हैं?” उनके प्रश्न बिल्कुल अनूठे होते थे; शायद इसलिए भी क्योंकि वे अधिकांश समय भिलाई शहर में रहते थे, जिससे ग्रामीण परिवेश के बारे में जानने को लेकर उनमें हमेशा एक कौतूहल रहता था। उनमें संकोच या बड़े-छोटे का कोई भाव नहीं था, बल्कि बच्चों जैसी निश्छल उत्सुकता थी। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि वे इतने बड़े साहित्यकार होकर उम्र और अनुभव में छोटे रजत से कोई सवाल क्यों करें। यहाँ तक कि जब कभी वे पारिवारिक चिंताओं या वैचारिक मतभेदों से घिरे होते थे, तो रजत से साझा करते और हल पूछते।

ह्वील चेयर पर रजतकृष्ण कवर्धा के साहित्यिक मित्रों के साथ

​शैलेश आगे बताते हैं कि नासिर भैया जिस किसी भी साहित्यिक आयोजन से जुड़े, उन्होंने रजत को हमेशा याद किया और कविता-पाठ के लिए आमंत्रित किया। नासिर जी कहा करते थे — “हालाँकि मैं रजत को भी महानदी के तट का कवि मानता हूँ, पर एकांत, पथिक, निर्मल या माझी से अलग मानता हूँ; भाषा, शिल्प और विषयों में गज़ब की विविधता है रजत के पास।” पेड़, पवन, आग… सीरीज की कविताएँ नासिर भैया को बेहद पसंद थीं। वे कहते थे कि रजत की कविताओं की प्रामाणिकता छत्तीसगढ़ के कई अन्य प्रख्यात कवियों से कहीं आगे है; बहुत से कवि शहर गए तो शहर के ही होकर रह गए, जबकि रजत की जड़ें ग्रामीण परिवेश में गहरी बनी रहीं।
​रजत बताते हैं कि नासिर भैया नए लेखकों को बहुत प्रोत्साहित करते थे। उनकी आलोचना में एक स्पष्ट वर्गीय दृष्टि थी। अगर किसी युवा की कोई रचना उन्हें जंच जाती, तो उनके लिए उस कवि से बड़ा कोई नहीं होता; वे उसे पूरा मान-सम्मान देते। साथ ही, किसी कविता के कमजोर पक्ष पर उँगली रखने से वे कभी कतराते नहीं थे। उनके पास एक व्यापक आलोचनात्मक दृष्टि थी। वह स्वयं बड़े सहज अंदाज़ के कवि थे; उनकी कविताओं में कोई बाहरी ताम-झाम नहीं होता था और अंत में एक ठोस विचार निकलकर सामने आता था। इस संदर्भ में रजत को लिखे पत्र में शामिल उनकी कविता “मनुष्य” को देखा जा सकता है:
​सर ऊँचा / माथा बेदाग
आँखों में पानी / मुँह में ज़ुबान सच्ची
सच्ची ज़ुबान में मिठास
शरीर का रंग चाहे जो हो / मन बिल्कुल उजला
हाथों में कोई न कोई काम / हुनर के लायक
पीठ दोहरी / पाँव परिश्रमी
किस सदी के मनुष्य की बात कर रहे हो कवि जी…

​रजत कहते हैं — “बात ही बात में वह बहुत मार्के की बात कह देते थे। ऊपरी तौर पर देखने पर पता ही नहीं चलता कि यह कविता है, पर जब ठहरकर पढ़ो, तो अहसास होता है कि यह कितनी कमाल की रचना है।”
​रजत को लिखे एक अन्य पत्र में नासिर भाई की “किताब का कवर” शीर्षक से एक कविता मिलती है:
​कविता की किताब / या कहानी, उपन्यास
स्कूल-पाठ्यक्रम या धार्मिक / कीमती अथवा सस्ती
कवर जरूर चढ़े / पुराना अखबार
कैलेंडर पुराना / बाजार में उपलब्ध / या कागज खाकी
यह कवर ही / जो बचाये मुख-पृष्ठ / होने से मैला
पानी में भीगे पहले कवर / धूल किताब से पहले / चढ़े कवर पर
जैसे शरीर से चिपकी बनियान / किताब कवर से
चित्थे-चित्थे उतरे बनियान / धज्जी-धज्जी कवर!

​रजत इस कविता पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि कवि यहाँ कवर की चिंता करता है ताकि अंदर की वस्तु सुरक्षित रहे। पूरी कविता दृश्यबिंब (चित्रमय) की तरह उभरती है। आखिरी पंक्तियों में देखिए कि कैसे एक मजदूर ऐसी बनियान पहने हुए है जो कई जगहों से फटी हुई है; ठीक वैसे ही जैसे किताब के कवर की धज्जियाँ उड़ गई हैं, पर मजदूर और किताब दोनों बचे हुए हैं। यहाँ नासिर जी ने प्रतीकात्मक रूप से बाह्य दिखावे और आंतरिक सत्य के बीच के अंतर को बहुत ही मार्मिक और व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। यह कविता दिखावे की दुनिया में असल जिंदगी की सादगी को बड़ी सहजता से कागज़ पर उतारती है।
​रजत के अनुसार, नासिर भाई की कविता “अनुकंपा में सर्विस करती परवीन बानो” बेमिसाल है। यह कविता कामकाजी महिलाओं की उन छिपी हुई चुनौतियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों को उजागर करती है, जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद भी सामाजिक और घरेलू बंधनों से घिरी रहती हैं। इस कविता में ‘परवीन बानो’ के माध्यम से नासिर जी उस रूढ़िवादी सोच पर सवाल उठाते हैं जहाँ स्त्री को केवल माँ, बहन या पत्नी के रूप में ही देखा जाता है, और उसकी स्वतंत्र पहचान व संघर्ष को नजरअंदाज़ कर दिया जाता है। परवीन बानो ने समाज के उस जकड़न को तोड़ा और उस विकल्प को चुना जो जीवन के पक्ष में जाता है। यही इस कविता का प्राणतत्व है — परवीन बानो ने ‘टूटने’ की बजाय ‘लड़ने’ को चुना।
​नासिर अहमद सिकंदर ने रजत को पचास से अधिक पत्र लिखे होंगे, जिनमें से कई तो दो-तीन पृष्ठों में फैले हैं। इन पत्रों में घर-परिवार, समाज, कवियों-लेखकों की बातें, नई योजनाएँ और उनके क्रियान्वयन में आ रही समस्याओं के समाधान की चर्चा है, तो बीच-बीच में रचनाकार की अपनी कुंठाओं और उनसे बाहर निकलने की जद्दोजहद भी है।
​रजत कृष्ण को लिखे 1 अगस्त 1994 के पत्र में नासिर लिखते हैं —
“तुम्हारी कविताओं को पढ़कर मैं इतना मुग्ध हो गया था कि तुम्हारे प्रशंसकों में शामिल हो गया हूँ। जो और जैसा मुझे कविताओं में दिखा, मैंने वही लिखा है; वाकई तुम्हारी कविताएँ इसकी हकदार थीं। बस एक कमी तुम्हारी कविताओं में खटकती रही, वह यह कि कविता के भीतर मौजूद कथ्य जब पूरी कलात्मकता के साथ उभर जाता है, तो अंत में तुम कोई न कोई ऐसी पंक्ति रख देते हो, जो न रहती तो कविता और अच्छी होती। आशय यह कि कोयला जब सुर्ख हो जाए, तो ये पंक्तियाँ उस पर राख की भाँति चढ़ जाती हैं।”
​इस प्रकार कहा जा सकता है कि उम्र में लगभग सात-आठ वर्ष बड़े होने के बावजूद नासिर अहमद सिकंदर, रजत और अन्य युवा रचनाकारों के साथ अत्यंत मित्रवत व्यवहार करते थे। वे केवल प्रशंसा ही नहीं करते थे, बल्कि बेहद सौम्य शब्दों में कड़ी आलोचना करने से भी पीछे नहीं हटते थे। शायद यही वजह थी कि उन्हें हमेशा अपने समकालीन और कनिष्ठ कवियों-लेखकों के बीच बहुत सम्मान और स्नेह मिला। वे सही मायनों में युवा कवियों-लेखकों के प्रकाश-स्तंभ थे।

लेखन ​प्रस्तुति: भास्कर चौधुरी ( बालको कोरबा)
संपर्क : 8319273093

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