रायपुर, छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा कीर्तिशेष कवि, देशबंधु समाचार पत्र समूह के पूर्व प्रधान संपादक स्व ललित सुरजन जी की स्मृति में एक विशेष आयोजन किया गया।
इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश जी ने मौजूदा दौर में पत्रकारिता की चुनौतियां इस विषय पर अपनी सारगर्भित और विचारोत्तेजक बात रखी। उर्मिलेश जी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत में ललित सुरजन जी के साथ अपने अनुभवों को याद किया। उन्होंने विषय प्रवेश करते हुए कहा – आजकल पत्रकारिता करना बहुत से कारणों से बहुत कठिन है पहले केवल अच्छी पत्रकारिता करना कठिन हुआ करता था।
अब केवल चाटुकारिता की पत्रकारिता करना फायदेमंद है, आनंददायक है, आरामदायक है।
भारत में अब भी मुख्यधारा की पत्रकारिता में दो चार बड़े अंग्रेजी के अखबार अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं, वे भी डरते हुए ही पत्रकारिता कर रहे हैं पर कर तो रहे हैं।
जो पहले मेन स्ट्रीम में थे वे अब वैकल्पिक मीडिया के काम कर रहे हैं, वे भी गलतफहमी में हैं वे मानते हैं कि केवल वैकल्पिक मीडिया ही अच्छा काम कर रहा है जबकि इसी मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा भी भक्ति में लीन है।
लाखों करोड़ों व्यूस के बावजूद जन पक्षीय पत्रकारों को भी समर्थन नहीं मिल पाता। जब तक आप सत्ता या विपक्ष किसी की पक्ष ध रता नहीं करता वो संकट में रहता है।
राजेंद्र माथुर जैसे संपादकों का उदाहरण दिया।
जैसा समाज वैसी पत्रकारिता और वैसा ही साहित्य
भारत में कभी भी पत्रकारिता का वैसा स्वर्णयुग नही रहा।
आजादी की लड़ाई के समय ही सबसे अच्छी पत्रकारिता भारत में हुई। प्रताप अखबार में गणेश शंकर विद्यार्थी इंग्लैंड, फ्रांस यूरोप की खबरें दूसरे ही दिन छाप दिया करते थे।
मेरठ और कानपुर अंग्रेजों के बड़ी आबादी वाले केंद्र थे।
वहां विदेशी अखबार मिल जाते थे वहीं के नोट्स से उनके अखबार के अंतरराष्ट्रीय आलेख तैयार होते थे।
मौलवी मुहम्मद बांके को तोप से 1857 में दिल्ली में उड़ा दिया गया थे वे देश के पहले शहीद पत्रकार माने जाते हैं।
आज उनकी शहादत पर केवल दिल्ली में आयोजन होता है देश में बहुत कम लोग उन्हें जानते हैं।
देहली उर्दू अखबार के वे संपादक थे जो हिन्दू मुस्लिम एकता और आजादी के बारे में लगातार लिखते थे।
भारत में आजादी के बाद लैंड रिफॉर्म और एडुकेशन रिफॉर्म का अधिकतम मीडिया घरानों ने कड़ा विरोध किया सबसे पहले काश्मीर में शेख अब्दुल्ला की सरकार को गिराया गया फिर केरल में EMS नंबूदरीपाद की CPI सरकार को नेहरू जी की सरकार ने गिराया। जबकि इसके बाद हिंदू कोड बिल के मुद्दे पर भारतीय मीडिया ने कड़ा विरोध किया, लगातार आलेख छपे, इसी तरह इंदिरा गांधी के लाये बैंकों और कोयला खदानों के राष्ट्रीय कारण का कड़ा विरोध प्रेस ने किया।
प्रिविपर्स खत्म किए जाने का विरोध भी अखबारों के माध्यम से राजघरानों ने किया था।
मध्यप्रदेश के विभिन्न स्थानों से कड़ा विरोध किया गया था।
आगे चल कर मंडल कमीशन के आने पर अधिकतर अखबारों ने इसके विरोध में लगातार कैंपेनिंग की। मंडल रिपोर्ट को संविधान विरोधी, राक्षस बताया । जबकि आर्टिकल 340 में इसका पूरा जिक्र है, रिपोर्ट को पूरी तरह देश विरोधी बताया।
के के बिड़ला का अखबार था, स्टेट बैंक था मिलें थी, इसीलिए तब सारे अखबार इसके खिलाफ ही लिखते हैं।
आज निजीकरण के कारण ऐसा माहौल बना दिया गया है कि निजी हस्पतालों में ईलाज कराना जीवन भर की बचत खत्म करना बन गया है। मीडिया इस निजीकरण में जनहित से दूर सहयोगी और उत्प्रेरक की भूमिका में है।
जन पक्षीय पत्रकारिता की कोशिश वैकल्पिक मीडिया को करते रहनी चाहिए।
दूसरे सत्र में सांप्रदायिक हिंसा सत्ता, समाज और स्त्री विषय पर दिल्ली से आई प्रो.रोहिणी अग्रवाल ने अपनी बात रखी, स्थानीय कथाकार उर्मिला शुक्ल ने उनसे सवाल किए।
तीसरे सत्र में ललित जी की पत्रकारिता पर पत्रकार दीपक पाचपोर ने अपनी बात रखी।
पांचवे सत्र में “शिक्षा, सरकार और नागरिक समाज” इस विषय पर कवि शरद कोकास ने कवि विचारक हेमलता महीश्वर से बातचीत की।
अंतिम सत्र में कवि लेखक पंकज राग ( भोपाल) ने जनचेतना के संगीतकार सलिल चौधरी के विभिन्न गीतों पर सुघड़ टिप्पणी के साथ सांगीतिक प्रस्तुति दी तथा अंत में रायपुर के सुपरिचित शास्त्रीय गायक दीपक व्यास एवं साथियों द्वारा ललित जी के पसंदीदा फिल्मी गीत प्रस्तुत किए गए ।
समूर्ण कार्यक्रम एवं विविध सत्रों का संचालन छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कवि रवि श्रीवास्तव तथा आयोजन समन्वयन पलाश सुरजन द्वारा किया गया।
इस आयोजन में भोपाल से कामरेड शैलेन्द्र शैली, कामरेड बादल सरोज , दुर्ग भिलाई से राजेश श्रीवास्तव, मणिमय मुखर्जी,संतोष झांझी, विद्या गुप्ता, डॉ संजय दानी, मीता दास, मनोरंजन दास, कवर्धा से सम्मेलन के महासचिव समय लाल विवेक, अजय , प्रो कुलमित्र , रायपुर से डॉ आलोक वर्मा, मिन्हाज असद, जीवेश चौबे, अरुण काठोटे, निसार अली , पूर्णचंद्र रथ , कॉमरेड संजय पराते, राजेंद्र चांडक डॉ दिनेश मिश्र, अंजू मेश्राम, राजिम से डॉ स्नेहलता आदि की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
इस अवसर ललित जी के साहित्य पर पीएचडी करने वाली छात्रा दिव्या पाठक का भी सम्मान किया गया।
आयोजन में ललित सुरजन जी के परिवार के लोग उनकी बेटियां सर्वमित्रा , तरुशिखा , अनुज पलाश सुरजन और मित्रों का महत्वपूर्ण योगदान रहा ।



