व्यंग्य- रचनाकार राकेश कायस्थ
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कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जहां कोई पंक्चर वाला होता है, उसके पड़ोस में एक चायवाला होता ही होता है। अब्दुल के घर से आई ईद की सेवइयों की कहानियां कोई भी चाय वाला आपको सुना देगा।
चाय वाली बिरादरी एक अलग तरह के कॉन्फिडेंस में है। उसे लगता है कि हमारे नुमाइंदे चाय बेचते-बेचते देश बेचने लगे लेकिन पड़ोसी पंक्चर वाला वहीं का वहीं रहा।
इसलिए किसी चाय वाले के मन में पंक्चर वाले के लिए दर्द उठता है, तो उसे सियासी नज़रिये से बिल्कुल नहीं देखना चाहिए। ये दो दोस्तों का मामला है, आप उन्हें उनके हाल पर छोड़िये और एआई की चिंता की कीजिये।
अमेरिका का एआई इनवेस्टमेंट भारतीय मुद्रा में लगभग 40 लाख करोड़ रुपये है। चीन का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इनवेस्टमेंट प्लान लगभग साढ़े बारह लाख करोड़ रुपये है।
दोनों महाशक्तियों के एआई निवेश में तीन गुना अंतर है। लेकिन सस्ते में काम करवाने की चीन की दक्षता का अमेरिका मुकाबला नहीं कर सकता ये भी पूरी तरह सच है।
भारत एक हिस्से में बच्चा अपनी माँ को पुकारने के लिए `ए आई’ कहता है, इसलिए एआई पर हमारी दक्षता जन्मसिद्ध है। इसके बावजूद भारत सरकार ने साढ़े चार हज़ार करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट एआई टेक्नोलॉजी के लिए रखा है।
बजट शून्य भी होता, तब भी एआई टेक्नोलॉजी आती ही। एक पुरानी कहावत है, जिस आइडिया के आने का वक्त हो गया हो, उसे कोई नहीं रोक सकता। एआई आ चुकी है और आनेवाले दिनों में इसका असर उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि के साथ नौकरियों में असाधारण कटौती के रूप में दिखाई देगा।
किन लोगों की नौकरियां जाएंगी? हर इंडस्ट्री में निचले स्तर बहुत बड़ी तादाद में ऐसे लोग होते हैं, जो बॉस के कहने पर एंटरनेट से रिसर्च करके, रिपोर्ट बनाकर शाम तक हवाले कर देते हैं और खुशी-खुशी ड्यूटी पूरी करके घर चले जाते हैं।
फोन कॉल पर अप्वाइंटमेंट फिक्स करना, अपने प्रोडक्ट के बारे में मोटे तौर पर क्लाइंट को जानकारी देना, यानी प्राथमिक स्तर पर कम दक्षता वाले कामों से जुड़ी जो नौकरियां हैं, वो देखते-देखते हवा हो जाएंगी।
हर कंपनी में दो-चार ऐसे विभाग होते हैं, जिनकी कोई ठोस उत्पादकता नहीं होती है, सिर्फ ज्ञान देकर उनका काम चल जाता है। रटे रटाये जुमलों से काम चलाने वाले मैनेजरों की एक प्रजाति होती है “ Not working, We need the ideas to disrupt the Industry. Something like that…”
Something like that.. से आगे क्या? जिसे पता नहीं है वो खतरे में है। लौटते हैं, पंक्चर वाले की दुकान पर।
हाथ का हुनर पश्चिमी दुनिया में बेहद महंगा है। एआई उत्पादकता बढ़ाएगा और हाथ के जिस हुनर को तत्काल रिप्लेस नहीं कर पाएगा, उस सेक्टर को कोई खतरा नहीं है बल्कि हाथ का हुनर और महंगा हो सकता है।
अब्दुल पंक्चर वाले की दुकान वैसे ही चलती रहेगी। साहब के दोस्त के दोस्त मस्क का ह्यूमेनाइड रोबो अगर दस साल में हर काम के लिए आ भी गया तो पंक्चर इंडस्ट्री में इतनी जल्दी नहीं घुसेगा।
लेकिन चाय के कियोस्क पर मशीने लग सकती हैं। बड़ी आसानी से आपको ऑटोमेशन के जरिये मनपसंद फ्लेवर की चाय मिल सकती है। यानी एआई से निकट भविष्य में ज्यादा बड़ा खतरा चायवाले को है, उसके दोस्त पंक्चर वाले को नहीं।
अब्दुल पर हंसने वाले बहुत से लोग भी अपना देख लें क्योंकि मुमकिन है, नौकरी जाने के बाद ईएमआई भरने के पैसे ना हो और बैंक कार उठाकर ले जाये। जब कार ही नहीं होगी तो पंक्चर वाले से क्या काम?



