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सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा निर्वाचित सरकारों के विधेयकों को रोकना असंवैधानिक बताया

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नई दिल्ली, 21 अगस्त 2025, राष्ट्रपति और राज्यपालों के बिलों पर साइन करने के लिए डेडलाइन लागू करने वाले मामले पर सुप्रीम कोर्ट में 19 अगस्त से लगातार सुनवाई हो रही है। इस महत्वपूर्ण विषय पर अब तक की बहस पर हुई चर्चा को समझने की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने 20 अगस्त बुधवार को कहा कि निर्वाचित सरकारें राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चल सकतीं। अगर कोई बिल राज्य की विधानसभा से पास होकर दूसरी बार राज्यपाल के पास आता है, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते।

संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास चार विकल्प होते हैं- बिल को मंजूरी देना, मंजूरी रोकना, राष्ट्रपति के पास भेजना या विधानसभा को पुनर्विचार के लिए लौटाना। लेकिन अगर विधानसभा दोबारा वही बिल पास करके भेजती है, तो राज्यपाल को उसे मंजूरी देनी होगी।

CJI बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने कहा कि अगर राज्यपाल बिना पुनर्विचार के ही मंजूरी रोकते हैं, तो इससे चुनी हुई सरकारें राज्यपाल की मर्जी पर निर्भर हो जाएंगी। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को यह अधिकार नहीं है कि वे अनिश्चितकाल तक मंजूरी रोककर रखें।

बेंच में CJI के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पी एस नरसिम्हा और ए एस चंदुरकर शामिल हैं। पांच जजों वाली बेंच गुरुवार को लगातार तीसरे दिन ‘भारत के राज्यपाल और राष्ट्रपति की तरफ से बिल को मंजूरी, रोक या रिजर्वेशन’ मामले की सुनवाई जारी रखेगी।

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ द्वारा दिया गया हालिया फैसला, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि राज्यपाल अनिश्चितकाल तक विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को रोक नहीं सकते और यदि विधानसभा दोबारा विधेयक पारित करती है तो उसे मंजूरी देना अनिवार्य है, भारत के संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में एक मील का पत्थर है। यह फैसला न केवल राज्यपालों की शक्तियों पर स्पष्ट सीमाएं निर्धारित करता है, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन और चुनी हुई सरकारों की स्वायत्तता को भी रेखांकित करता है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल को विधायी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। वे विधेयकों को मंजूरी दे सकते हैं, रोक सकते हैं, राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं या पुनर्विचार के लिए विधानसभा को लौटा सकते हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर बल दिया कि यदि विधानसभा दोबारा वही विधेयक पारित करती है, तो राज्यपाल के पास उसे मंजूरी देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यह फैसला उन राज्यों के लिए राहतकारी है जहां राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच विधेयकों को लेकर टकराव देखा गया है, जैसे तमिलनाडु, केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल।

इस फैसले के राजनीतिक मायने गहरे हैं। हाल के वर्षों में, केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारों के बीच बढ़ते टकराव ने राज्यपालों की भूमिका को विवादास्पद बना दिया है। कई मामलों में, राज्यपालों को केंद्र सरकार के “प्रतिनिधि” के रूप में देखा गया, जो विधेयकों को रोककर या राष्ट्रपति के पास भेजकर चुनी हुई सरकारों पर दबाव बनाते हैं। यह स्थिति न केवल संघीय ढांचे को कमजोर करती है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी बाधित करती है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केंद्र की इस कथित रणनीति पर अंकुश लगाता है और राज्यों की विधायी स्वायत्तता को मजबूत करता है।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की टिप्पणी कि “संविधान एक जीवंत दस्तावेज है” इस फैसले की आत्मा को दर्शाती है। संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या को समय और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप ढालना आवश्यक है। यह दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि संवैधानिक संस्थाएं आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ तालमेल बनाए रखें। केंद्र सरकार की दलील कि राज्यपाल को “पोस्टमैन” की भूमिका में सीमित नहीं किया जा सकता, यह दर्शाती है कि वह राज्यपालों को स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में देखना चाहती है। लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह स्वतंत्रता असीमित नहीं हो सकती।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से पूछे गए 14 सवाल इस मुद्दे की जटिलता को दर्शाते हैं। यह एक असामान्य कदम था, जिसे केंद्र की ओर से अपनी स्थिति को मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि संवैधानिक व्याख्या राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होगी। यह रुख न केवल कोर्ट की निष्पक्षता को दर्शाता है, बल्कि संवैधानिक संस्थानों की स्वतंत्रता को भी मजबूत करता है।

इस फैसले का प्रभाव केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं है। यह विपक्षी दलों को केंद्र सरकार की कथित “अति-केंद्रीकरण” की नीतियों के खिलाफ एक मजबूत तर्क देता है। उन राज्यों में, जहां राज्यपालों और सरकारों के बीच टकराव जनता के बीच चर्चा का विषय रहा है, यह फैसला जनमत को प्रभावित कर सकता है। यह केंद्र सरकार के लिए भी एक चेतावनी है कि संवैधानिक संस्थानों का दुरुपयोग लंबे समय तक स्वीकार्य नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत के संघीय ढांचे को मजबूत करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह चुनी हुई सरकारों की स्वायत्तता को सुनिश्चित करता है और संवैधानिक संस्थानों की जवाबदेही को रेखांकित करता है। लंबे समय में, यह केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को और अधिक पारदर्शी और लोकतांत्रिक बनाने में योगदान देगा। यह फैसला न केवल कानूनी, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने का एक ऐतिहासिक कदम है। इस फैसले से न्यायालय पर जनसामान्य का भरोसा भी बढ़ेगा।

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