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4 नए श्रम कानूनों में मजदूरों के ख़िलाफ़ प्रावधान ज्यादा, पत्रकारों को 1955 के कानून से दी गई सुरक्षा भी खत्म

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लेबर कोड यानी गुलामी के दस्तावेज के विरोध में प्रस्ताव
जनवादी लेखक संघ के 11 वें राष्ट्रीय सम्मेलन में पारित प्रस्ताव
(केंद्र की सरकार द्वारा जिन चार लेबर कोड को लागू किया जा रहा है और जिसे मजदूरों के हितों के पक्ष में बताया जा रहा है वे दरअसल मजदूरों और कर्मचारियों के विरोध में उठाए गए कदम है । जनवादी लेखक संघ ने दो माह पूर्व हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया था, उसे यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।)

लेबर कोड कानून मालिकों द्वारा मजदूरों पर नव उदारवाद के जरिये हमलों का अगला चरण है. जिस समय हमारा देश कोरोना महामारी से ग्रस्त (2019-20) था उस समय आपदा को अवसर की तरह इस्तेमाल करते हुए नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने यदि एक और कृषि क्षेत्र को पूंजीवादी हाथों में सौंपने के लिए किसान विरोधी कृषि क़ानून लागू करने की कोशिश की, तो दूसरी ओर, श्रम कानूनों को सरलीकृत और आधुनिक बनाने के नाम पर चार लेबर कोड के अंतर्गत समस्त श्रम कानूनों को समेटते हुए उन्हें इस तरह संशोधित किया गया जिससे लम्बे संघर्ष से हासिल मजदूरों के हितकारी कानूनों को या तो कमजोर कर दिया गया या उनको पूंजीपतियों के हित में बदला गया. पत्रकारों के लिए लागू श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम 1955 को भी लगभग खत्म कर दिया है। कृषि कानूनों को तो लम्बे संघर्ष और बलिदान के बाद सरकार को वापस लेने को मजबूर किया लेकिन यह चार लेबर कोड के विरुद्ध मजदूर वर्ग को कामयाबी मिलना शेष है.

पहला कोड मजदूरी संहिता के बारे में हैं जिनमें मजदूरी भुगतान अधिनियम, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, बोनस भुगतान अधिनियम और समान पारिश्रमिक अधिनियम को शामिल किया गया है. इस कोड में न तो न्यूनतम मजदूरी की परिभाषा दी गयी है और न ही इसकी गणना का कोई सूत्र. अब न्यूनतम मजदूरी ‘न्यूनतम मजदूरी सलाहकार बोर्ड’ से छीनकर कानून द्वारा तय न करके सरकार ने इसे अपने हाथ में ले लिया है. काम के घंटे भी अब सरकार तय करती है.

दूसरा कोड औद्योगिक सम्बन्धी संहिता के बारे में हैं जिनमें तीन पुराने कानूनों को शामिल कर दिया गया है। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926 और औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946। इस कोड के अनुसार जो सुपरवाइजरी पद पर कार्यरत है और प्रतिमाह 18000 रुपये या अधिक वेतन पाता है तो वह मजदूर की परिभाषा में नहीं आएगा। अगर किसी को निश्चित अवधि के लिए नियुक्त किया जाता है तो उसे उसके बाद बिना नोटिस या मुआवजे के नौकरी से हटाया जा सकता है। मालिक यह अवधि एक वर्ष से कम की रख सकता है। वे पद जिनकी प्रकृति तो स्थायी है लेकिन उन पर भी निश्चित अवधि के लिए नियुक्ति करने पर कोई रोक नहीं है और उस व्यक्ति को जिसे निश्चित अवधि के लिए नियुक्त किया गया है, उसे ही बार बार नियुक्त किया जाता रहता है। और इस तरह स्थायी नियुक्ति से होने वाले लाभों से उसे वंचित रखा जाता है. निश्चित अवधि के लिए काम करने वाले इस डर से कि उनकी नौकरी कभी भी जा सकती है।

मालिक की शर्तों के अनुसार काम करने को मजबूर होंगे. किसी भी औद्योगिक इकाई में काम पर रखने, हटाने और उस प्रतिष्ठान को बंद करने के लिए सरकार से स्वीकृति के लिए अब मजदूरों की संख्या बढ़ाकर 300 कर दी गयी है इससे अधिकतर कारखानों से मजदूरों को निकालना और छंटनी करना आसान हो जायेगा।

इस कोड से श्रमिकों के लोकतान्त्रिक अधिकारों पर भी रोक लगेगी. कम से कम 10 फ़ीसदी सदस्यता पर ही ट्रेड यूनियन को मान्यता मिलेगी और 50 प्रतिशत सदस्यता वाले यूनियन को ही प्रबंधन से समझौता करने का अधिकार होगा. अगर मजदूर संगठनों और प्रबंधन के बीच समझौता नहीं होता है तो मामले को ट्रिब्यूनल को अग्रसारित करना बाध्यकारी नहीं होगा . इस तरह इस दूसरे कोड में भी किये गए बदलाव मजदूरों के हितों के विरुद्ध हैं और उनमें असुरक्षा पैदा करेगी और उनकी सौदेबाजी करने की ताकत को कमजोर करती है.

तीसरे कोड में नौ श्रम कानूनों को समेटा गया है. कर्मचारी मुआवजा अधिनियम 1923, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948, कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम 1952, रोज़गार कार्यालय (रिक्तियों की अनिवार्य अधिसूचना) अधिनियम 1959, मातृत्व लाभ अधिनियम 1961, ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम 1972, सिनेमा श्रमिक कल्याण निधि अधिनियम 1961, भवन और अन्य निर्माण श्रमिक उपकर अधिनियम 1996, असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008. पीएफ केवल उन प्रतिष्ठानों पर लागू होता है जिनमें 20 या अधिक कर्मचारी हो, ईएसआई सुविधा केवल उन प्रतिष्ठानों पर लागू होती है जहाँ 10 या उससे अधिक कर्मचारी हों, ग्रेच्युटी, मातृत्व लाभ और भवन और अन्य निर्माण कार्य भी उन प्रतिष्ठानों पर लागू होती हैं जहाँ 10 या उससे अधिक कर्मचारी हो. इस प्रकार 40 करोड़ से अधिक श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा का दावा एक धोखा है. असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए न तो कोई योजना कानूनी तौर पर लागू की गयी है और न ही किसी कल्याणकारी योजना के लिए धन निर्धारित किया गया है. पीएफ में अंशदान की दर को 12 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया है. यह कोड कर्मचारी राज्य बीमा योजना में मालिकों द्वारा उल्लंघन में दंडात्मक ब्याज दर कम करता है. अन्य बहुत से क्षेत्रों में भी दंडात्मक ब्याज दर को कम किया गया है.

चौथे कोड का संबंध व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियों से सम्बंधित 13 कानूनों से है जिन्हें इस कोड में शामिल किया गया है. कारखाना अधिनियम, अनुबंध श्रम (विनियमन और उन्मूलन) अधिनियम, भवन निर्माण एवं अन्य निर्माण श्रमिक (रोज़गार विनियमन एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, बिक्री संवर्धन कर्मचारी (सेवा शर्तें) अधिनियम, अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक (रोज़गार विनियमन) अधिनियम, मोटर परिवहन श्रमिक अधिनियम, सिनेमा श्रमिक एवं सिनेमा थिएटर श्रमिक (रोज़गार विनियमन) अधिनियम, बागान श्रमिक अधिनियम, खान अधिनियम, *श्रमजीवी पत्रकार एवं अन्य समाचारपत्र कर्मचारी (सेवा शर्तें) एवं विविध प्रावधान अधिनियम*, श्रमजीवी पत्रकार (मजदूरी की दरों का निर्धारण) अधिनियम, बीडी एवं सिगार श्रमिक (रोज़गार शर्तें) अधिनियम, गोदी श्रमिक (सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कल्याण अधिनियम. ये पुराने कानून हर सेक्टर के विशेष कार्य पैटर्न, प्रक्रियाओं, समस्याओं एवं मुद्दों को ध्यान में रखते हुए बनाये गए थे, अब यह कोड सभी सेक्टर के लिए एक ही मॉडल रखता है. कोड कवरेज को कम करके असंगठित क्षेत्र के अधिकांश श्रमिकों को कवरेज से बाहर करता है. कोड सिविल न्यायालयों को संहिता के अंतर्गत किसी भी मामले की सुनवाई करने से रोकती है. यह कोड ठेका प्रथा को आगे बढाता है. नये नियमों के अनुसार 50 से कम कर्मचारी रखने वाले ठेकेदारों को लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं है जबकि पहले 20 कर्मचारी पर लाइसेंस लेना होता था. इससे ठेकेदारों को बिना नियंत्रण के श्रमिकों का शोषण करने का अवसर मिल जाता है.

इन चार लेबर कोड का प्रभाव श्रमिकों पर कई रूपों में दिखाई देगा. 18000 रुपये से अधिक वेतन पाने वाले मजदूर मजदूर की श्रेणी में नहीं माने जायेंगे. अब यूनियनें बेलेंस शीत देखकर बोनस की मांग नहीं कर सकते. निश्चित अवधि के जरिये पक्के मजदूरों की ताकत को कम किया जायेगा. निश्चित अवधि वाले मजदूर यूनियनों से जुड़ने से डरेंगे. समान काम के लिए समान वेतन को लेबर कोड निरस्त करता है. इस तरह मजदूरों ने लम्बी लड़ाई से जो कुछ हासिल किया था उसे खोने का खतरा पैदा हो गया है. मजदूरों के अधिकारों के इस लम्बे संघर्ष को जनवादी लेखक संघ का यह राष्ट्रीय सम्मलेन पूरा समर्थन करता है और उनके इस संघर्ष में वह उनके साथ है.

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