परिसीमन विधेयक, महिला आरक्षण बिल पर सरकार और मुखिया का बर्ताव
आलेख: प्रियदर्शन
लोकसभा में 131वां संविधान संशोधन विधेयक गिरने के बाद प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन पर राष्ट्र को संबोधित किया। लेकिन यह संबोधन बिल्कुल एक राजनीतिक भाषण था जिसमें प्रधानमंत्री महिलाओं के 33 फ़ीसदी आरक्षण की राह रोकने के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहरा रहे थे। तो क्या इस भाषण से प्रधानमंत्री ने ख़ुद अपनी और संसद की भी गरिमा नहीं गिराई?
दरअसल तटस्थ ढंग से देखें तो सरकार का प्रस्तुत विधेयक कांग्रेस ने खारिज नहीं किया, वह इस देश की संसद ने ख़ारिज किया। संसद सर्वोच्च है और सरकार को कोई भी कानून बनाने के लिए उसकी सहमति चाहिए। संसद ने एक संशोधन पर यह सहमति नहीं दी। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को यह राय सिर झुका कर स्वीकार करनी चाहिए थी। लेकिन सरकार नाराज़ हो गई कि संसद ने उसकी बात क्यों नहीं मानी। प्रधानमंत्री लोगों के बीच जाकर बिल्कुल चुनावी अंदाज़ में बताने लगे कि महिलाएं अपना अपमान नहीं भूलतीं, वे कांग्रेस को सबक सिखाएंगी। क्या प्रधानमंत्री यह कहना चाहते थे कि महिलाएं संसद को सबक सिखाएंगी? क्योंकि असहमति तो संसद ने जताई थी, कांग्रेस उसका हिस्सा भर थी।
लेकिन यहां से एक चिंताजनक ख़याल आता है। क्या हमारी संसदीय व्यवस्था धीरे-धीरे सरकार द्वारा अपहृत कर ली जा रही है? क्या सरकारें अपनी इच्छा और मर्ज़ी संसद पर थोप रही है? संसद में ज़रूरी विधेयकों पर बहस नहीं होती, उन्हें सीधे पारित करा लिया जाता है। संसद में उठाए जा सकने वाले मुद्दों को सरकार टालती रहती है। 131वें संविधान संशोधन विधेयक से पहले बजट सत्र में ही सरकार ने ट्रांसजेंडर संशोधन बिल पास कराया- जबकि विपक्ष इस बहुत महत्वपूर्ण बिल पर और ज़्यादा विचार की ज़रूरत महसूस कर रहा था और चाहता था कि इसे संसद की प्रवर समिति के पास भेजा जाए। बिल पास होने के बाद अलग-अलग मानवाधिकार संगठन लगातार चिंता भी जता रहे हैं। क्योंकि इस बिल में ट्रांसजेंडर लोगों की पहचान उनके अपने कहने से नहीं होगी, इसके लिए मेडिकल बोर्ड बनेगा और उसकी सिफ़ारिश पर ही प्रशासन मानेगा कि कोई व्यक्ति ट्रांसजेंडर है या नहीं। व्यक्तिगत पहचान और गोपनीयता के इस सरासर उल्लंघन करने वाले क़ानून पर भी संसद में पूरी और ज़रूरी बहस नहीं हुई।
दरअसल यह दिखाई पड़ता है कि लोकसभा के अध्यक्ष या राज्यसभा के उपसभापति भी अक्सर सरकार के प्रतिनिधि की तरह काम करते हैं। वे नियमों और व्यवस्था का सवाल विपक्ष के लिए उठाते हैं, सरकार के लिए नहीं। बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान इसका एक उदाहरण सामने आया। राहुल गांधी इस चर्चा में जब जनरल मनोज नरवणे की किताब के माध्यम से सरकार से सवाल पूछना चाहते थे तो उन्हें जबरन रोका गया। पहले कहा गया कि यह किताब प्रकाशित नहीं है, फिर कहा गया कि इसकी प्रति पहले सदन में जमा करानी होगी। फिर कहा गया कि राष्ट्रपति के भाषण पर ही केंद्रित चर्चा हो, उससे अलग नहीं। अंततः राहुल गांधी नहीं बोल पाए।
लेकिन प्रधानमंत्री जब चर्चा का जवाब देने उठे तो उन्होंने कम से कम पंद्रह मिनट जेएनयू के कुछ अनजान छात्रों द्वारा उनके ऊपर लगाए गए नारों पर खर्च किया- मोदी तेरी क़ब्र बनेगी। निश्चय ही यह अच्छा नारा नहीं था लेकिन ये छात्र न किसी दल से संबंधित निकले न किसी ने उनका समर्थन किया। न राष्ट्रपति के अभिभाषण में उनका ज़िक्र था, फिर भी लोकसभाध्यक्ष ने उन्हें याद नहीं दिलाया कि वे अपना वक्तव्य इस राजनीतिक टीका-टिप्पणी से अलग राष्ट्र्पति के अभिभाषण पर केंद्रित करें।
131वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर तो लोकसभाध्यक्ष को प्रसन्न होना चाहिए था कि कम से कम उनकी ताक़त और हैसियत दिखी, संसद की वह सर्वोच्चता साबित हुई, जो संविधान ने दी है। यही नहीं, क़ायदे से उन्हें सरकार से पूछना चाहिए कि लोकसभा द्वारा नामंज़ूर विधेयक का मसला वे अपने राष्ट्रीय संबोधन में क्यों उठा रहे हैं? क्या लोकसभा के फ़ैसले के प्रति उनमें सम्मान नहीं है?
दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री का भाषण इस असम्मान का ही द्योतक नहीं था, वह एक असत्य का भी सूचक था। लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक नहीं गिरा था। वह तो 2023 में ही पारित हो चुका था और उसकी अधिसूचना भी सरकार ने लोकसभा की बहस के दौरान ही जारी कर दी थी। हालांकि यह भी लोकसभा की अवमानना का ही मसला था। जो विधेयक गिरा, उसके नाम में कहीं महिला आरक्षण संशोधन विधेयक भी नहीं लिखा हुआ था। यानी प्रधानमंत्री ने पहले लोकसभा को गुमराह करने की कोशिश की, जब वह नहीं हुई तो उन्होंने देश को गुमराह करना चाहा।
यह हमारे लोकतंत्र के लिए चिंता की घड़ी है। संयोग से यही वे दिन हैं जब हमारी संवैधानिक संस्थाओँ की विश्वसनीयता दांव पर दिख रही है। बिहार से बंगाल तक मतदाता सूचियों के विशेष गहन परीक्षण- यानी एसआईआर- पर अड़ा चुनाव आयोग विपक्ष के कठघरे में है। विपक्ष ने बाक़ायदा संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया, जिस पर दोनों सदनों को मिला कर सौ से ज़्यादा सांसदों के हस्ताक्षर के बावजूद पता नहीं क्यों, लोकसभाध्यक्ष ने स्वीकार नहीं किया। यह स्थिति तब है जब बंगाल के चुनाव में 27 लाख नागरिकों से वोट देने का अधिकार छीना जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट से सबको उम्मीद है, लेकिन मतदान का पहला दौर बीत चुका है। ऐसे में नागरिकों की बढ़ती हताशा और संसद के प्रति सरकार की अवमानना हमारे लिए शुभ संकेत नहीं है।
(लेखक श्री प्रियदर्शन प्रिंट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


