(अनिल मालवीय)
भारतीय संस्कृति में भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में देखा जाता है। गाँव गाँव उनकी कथा इसलिए कही जाती है ताकि राजनेता से लेकर आम जनता मर्यादा का पालन करना सीखे। परंतु, बीते एक दशक से राम की मर्यादा को तार-तार किया जा रहा है। डर इस बात का है कि कहीं राम को दंगाई के रूप में लोग न देखने लगें।
बीते कई सालों से राम जी के चाहने वालों की तादाद में भारी इजाफा हुआ है। उनके नाम पर जमकर राजनीति भी हुई और सत्ता पर काबिज होने के लिए दुरुपयोग भी। स्थिति यहाँ तक आ पहुंची है कि बीते कुछ सालों से लोगों को डराने के लिए राम के नारे लगाए जा रहे हैं। उनके नाम पर जहर उगला जा रहा है। दंगाई लोगों की जान ले रहे हैं घर फूंक रहे। उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नज़र नहीं आ रहा।
यह राम को चाहने वालों का न तो आचरण हो सकता और न बोल। अफ़सोस ,इस मामले में साधु और संत समाज मौन स्वीकृति राम की मर्यादा को धूमिल कर रही है। हालांकि, इन परिस्थितियों के लिए यदि संघ और उनसे जुड़े संगठनों को जिम्मेदार ठहराया जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्होंने ने साधुओं और साध्वियों का प्रयोग ज़हर उगलने के लिए किया जो निरंतर जारी है। इन लोगों ने अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना राजनेताओं तक को सिखा दिया। अब धड़ल्ले से इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे सबसे बड़ा नुकसान राम की छवि पर पड़ रहा है। देश की नई पीढ़ी राम के नारे दहशत और दंगे के लिए कर रही है। बुद्धिजीवियों से लेकर समाज सुधारक खामोशी से तमाशा देख रहे हैं। मीडिया की भूमिका किसी से छिपी नहीं है । क्योंकि वह राजसत्ता के रंग में रंग चुकी है। वही विपक्षी दल हताश हैं ।
बस, राम ही कोई रास्ता निकाल सकते हैं। क्योंकि उन्होँने दबे कुचले, गिरीजनों, आदिवासियों की आवाज सुनी थी



