Home देश मीडिया ने ढूंढी कोरोना की काट – वरिष्ठ पत्रकार अनिल मालवीय की...

मीडिया ने ढूंढी कोरोना की काट – वरिष्ठ पत्रकार अनिल मालवीय की कलम से

554
0
file photo

(अनिल मालवीय)  
आखिर जिस बात का डर सता रहा था, वही हुआ । कोरोना वाइरस के बढ़ते प्रकोप से केंद्र सरकार घिरती जा रही थी।

लगातार यह प्रश्न लोगों के जहन में कौंध रहे थे कि इसकी गंभीरता का आंकलन केंद्र सरकार ने क्यों नहीं किया! सबसे बड़ी बात कि जो लोग विदेश से आ रहे थे उन्हें एअरपोर्ट पर ही क्वंटराइन क्यों नहीं करवाया गया । यदि उस वक्त सरकार इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए गंभीर होती तो ऐसे हालात का सामना मुल्क वासियों को न करना पड़ता ।सवाल यह उठता है कि क्या सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का भान नहीं था? यदि था तो ऐसी परिस्थिति क्यों आई ? अपने आकाओं को इन सवालों में घिरता देख मीडिया का एक तबका सरकार को बचाने में लग गया। आख़िरकार उसने काट ढूंढ़ ही ली।उसने कोरोना वायरस को दो समुदाय में बांटने के लिए उठा लिया। अब वह सारी तोहमत एक समुदाय पर थोपता जा रहा है ।

वह यह भूल गया कि जब मध्यप्रदेश के 16 विधायक कर्नाटक के रिजार्ट में थे तब भी कोरोना का संकट मुल्क में था।
मीडिया का एक गुट यह सवाल नहीं उठा रहा कि जो लोग विदेश से आकर लोगों में घुलमिल गए क्या वे वाइरस फैलाने दोषी नहीं ? उसमें सरकारी अफसर तक शामिल थे । शायद उन्हें वायरस नहीं छूता है ।

दरअसल, मीडिया का एक भाग जिस तरह से कार्य कर रहा है । वह भारतीय समाज के लिए घातक सिद्ध हो रहा है । बताते चले कि दिल्ली मे हुए विधानसभा चुनाव के दौरान इसी मीडिया ने सत्तारूढ़ दलों से सांठ गांठ करके दो समुदाय में मनमुटाव पैदा किया था और आखिरकार दिल्ली के कुछ हिस्से में दंगे हुए जिसमें कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा । परंतु, वह सफलता नहीं मिली जिसका इस गुट को इंतजार था। यदि इन मीडिया घराने पर नज़र डाली जाए तो सारी परते खुलती नज़र आएंगी।

यह ठीक है कि कुछ लोगों ने गलतियां की हैं और तमाम लोगों की जान खतरे में डाल दी हैं । लेकिन पूरे समाज को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता है । समाज में हर तरह के लोग शामिल हैं । कुछ सिरफिरे पूरी कौम का सिर झुकाने का काम कर रहे हैं । इनसे सख्ती से निपटाना जरूरी ताकि चंद लोगों की गलती की सजा सबको न मिले ।

फिलहाल, हमें उनसे भी सतर्क रहना है जे एक सेट एजेंड़े के तहत
हर उन लोगों पर अंगुली उठा रहा है जो केंद्रीय सत्ता से सवाल कर रहे हैं । यह वर्ग कभी गरीब,कभी जाति कभी समुदाय को निशाना बनाकर समाज को निरंतर गुमराह कर रहा है । वह चुने हुए सत्ताधारी प्रतिनिधियों से सवाल नहीं कर रहा कि चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाने वाले प्रतिनिधि कहां गुम हैं। मंहगी शादी करने वाले मंत्री कहां सो रहे हैं ? स्वयं करोड़पति मीडिया घराने दान करने से क्यों कतरा रहे हैं ? फिलहाल, संकट के इस दौर में संयम और धैर्य के साथ घर पर रहते हुए ऐसे लोगों की काट पर विचार करना होगा ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here