नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी)ने रायगढ़ के तमनार में स्थित गारे IV- 2/3 कोयला खदानों में पर्यावरण और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने पर नामी निजी कंपनी जिंदल पावर और सरकारी कंपनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटिड पर 160 करोड़ रुपए (1.6 बिलियन) का संयुक्त जुर्माना लगाया है।एनजीटी ने एक इसी तरह के एक अन्य मामले में भी तमनार और घरघोड़ा में खनन में बड़े पर्यावरणीय उल्लंघन पर अपनी गलतियों को स्वीकार कर सख्त निर्देश और उपचारात्मक उपाय जारी किये।
एनजीटी ने दो कोयला खनन कंपनियों – जिंदल पावर लिमिटेड (जेपीएल)और साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) पर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की तमनार तहसील की गारे IV-2/3 कोयला खदानों में पर्यावरण और स्वास्थ्य उल्लंघन के लिए 160 करोड़ रुपए का संयुक्त जुर्माना लगाया है। दुकालू राम व अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में एनजीटी का आदेश अदालत द्वारा नियुक्त एक उच्च-स्तरीय समिति द्वारा इलाके में कोयला खदान द्वारा पर्यावरण और स्वास्थ्य क्षति की शिकायतों का आकलन करने के बाद यह निर्णय आया और इसी के आधार पर जुर्माना राशि तय हुई। समिति ने जून 2019 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। यह विवादास्पद खदान 2004 से 2015 तक जेपीएल के स्वामित्व और संचालन में थी और तब से एसईसीएल के कब्जे में है।
याचिकाकर्ता दुकालु राम, शिवपाल भगत, भगवती भगत, कान्ही पटेल, दुरपति मांझी, रिनचिन, जानकी तथा श्रीराम गुप्ता के अनुसार रिपोर्ट मुआवजे के मूल्यांकन के आधार पर स्वीकार की जाती है, एनजीटी ने 20 मार्च के आदेश में कहा कि जेपीएल और एसईसीएएल को एक महीने के भीतर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास राशि जमा करने का निर्देश दिया गया है। इस आदेश ने छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (सीएसईबी) को भी पर्यावरण में सुधार करने और इलाके की बदहाली के लिए राशि का उपयोग करने के लिए एक कार्य योजना तैयार करने का निर्देश दिया। एनजीटी ने अपने आदेश में एसईसीएएल को लीज सीमा के चारों ओर ब्लैक टॉप रोड और 125 मीटर चौड़ाई की ग्रीन बेल्ट के विकास के लिए समयबद्ध कार्य योजना पेश व कार्यान्वित करने, और ट्रिब्यूनल के पिछले आदेश के अनुसार कोयला खनन से प्रभावित ग्रामीणों को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने का भी निर्देश दिया।
यह आदेश गांव कोसमपल्ली और सरसमल के निवासियों के लंबे कानूनी संघर्ष के बाद आया है जो खनन कंपनियों द्वारा पर्यावरणीय मानदंडों और अन्य अवैधताओं के उल्लंघन के खिलाफ लड़ रहे हैं।
हालांकि आदेश के वास्तविक कार्यान्वयन का रास्ता अभी भी लंबा होगा, पर प्रभावित गांवों के निवासी और याचिकाकर्ता इसे नैतिक और कानूनी जीत के रूप में देखते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है, एनजीटी का आदेश उन लोगों के लिए एक जीत है, जिन्होंने इलाके में कोयला खदान होने की वजह से गंभीर वायु प्रदूषण, भूजल में कमी, खदानों की आग और उनके स्वास्थ्य पर भारी प्रभाव का सामना किया है। याचिकाकर्ताओं ने दक्षिण कोसल से कहा है कि अदालत के आदेश का स्वागत करते हैं और अब राज्य प्रशासन और एनजीटी से आग्रह करते हैं कि इस जुर्माना की वसूली को सुनिश्चित किया जाए और इन सिफारिशों को खास तौर पर बहाली, क्षतिपूर्ति और राहत को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खनन गतिविधियों का कोई और नुकसान न हो। हम सरकार से यह सुनिश्चित करने का आग्रह करते हैं कि जब तक इन सभी उल्लंघनों में सुधार नहीं किया जाता है और प्रतिकूल प्रभाव का असर ठीक नहीं होता है, तब तक इस क्षेत्र में कोई नई खदान शुरू नहीं की जाएगी।
रायगढ़ जिले में कोयला खदानों में चल रहे पर्यावरण और स्वास्थ्य उल्लंघन के संबंध में एनजीटी का यह दूसरा आदेश है। शिवपाल भगत व अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया से संबंधित एक अन्य मामले में, तमनार और घरघोड़ा में कोयला खदानों और बिजली संयंत्रों के कारण इस इलाके में बिगड़ती पर्यावरणीय स्थितियों पर संज्ञान लेते हुए एनजीटी ने इस साल के शुरूआत फरवरी में एक व्यापक आदेश पारित किया था। इस आदेश में एहतियाती और सतत विकास सिद्धांतों को लागू करते हुए इलाके में किसी भी तरह के विस्तार या नई परियोजनाओं को सिर्फ गहन मूल्यांकन के बाद ही अनुमति दें। इस इलाके में उच्च स्तरीय संदूषण को नजऱ में रखते हुए कोयला और पर्यावरण मंत्रालय दोनों को अपनी पूरी क्षमता के साथ इन प्रस्तावों की निगरानी करनी होगी। एनजीटी ने भूमिगत खदानों को खुली खदानों में बदलने, निचले या किसी खुले इलाके में राख (फ्लाई ऐश) की डंपिंग करने के खिलाफ सख्त रखरखाव करने का निर्देश भी जारी किया गया है और सभी बताया गया है कि उपचारात्मक उपायों की लागत कम्पनियों द्वारा वहन की जाएगी।
एनजीटी ने यह भी निर्देश दिया कि एक प्रभावी तंत्र स्वास्थ्य में सुधार के लिए उपायों की निगरानी करे और स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को इसकी देखरेख करने की जिम्मेदारी दी जाए। ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रदूषण मामले में कहीं भी अदालत ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग को कार्रवाई में शामिल किया है और विशेष रूप से उसे स्वास्थ्य सुधार योजना की देखरेख करने का जिम्मा सौंपा है।
एनजीटी का ये हालिया आदेश इस संघर्ष में एक और कदम है जिसमें इलाके के लोग बड़े कोयला खनन निगमों द्वारा पर्यावरणीय मानदंडों के उल्लंघन के खिलाफ लड़ रहे हैं, जिससे गंभीर प्रदूषण हुआ है और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा है।
याचिकाकर्ताओं ने सभी वकीलों, पर्यावरणविदों और डॉक्टरों को भी धन्यवाद दिया जिन्होंने इस संघर्ष में उनका समर्थन किया है सहयोग कर रहे हैं और उन विशेषज्ञों को भी धन्यवाद दिया है जिन्होंने सर्वेक्षण करने में मदद की है, जिससे पर्यावरण के उल्लंघन और प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभावों के उनके दावों को साबित करने का एक आधार मिला है।



