Home देश एक कानूनी मसला – मज़दूरों कर्मचारियों को लॉकडाउन में राहत की जवाबदारी

एक कानूनी मसला – मज़दूरों कर्मचारियों को लॉकडाउन में राहत की जवाबदारी

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प्रोफेसर प्रभात पटनायक
(इंडिया न्यूज रूम डेस्क ) देश में लॉकडाउन में मज़दूरों की दुर्दशा पर ढेर सारे विमर्श किये गए देश के चर्चित विचारक , अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक के विचारों को कोलकाता के टेलीग्राफ में प्रकाशित किया साभार जिसका हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है)

इस मसले का सम्बन्ध किसी वामपंथ, दक्षिणपंथ अथवा केन्द्रवाद से नहीं है. असल में तो इन लफ्जों में उलझना एक विषयांतर होगा. यह तो सीधे सीधे वैधता का मामला है. जब भी कोई राजसत्ता किसी व्यक्ति की संपत्ति का अधिग्रहण करती है, तब कानूनन वह व्यक्ति क्षतिपूर्ति का हकदार होता है. इसी प्रकार, जब भी सरकार के कार्यों से किसी को अपनी आमदनी से हाथ धोना पड़ता है, जिस आमदनी का अन्यथा वह हकदार था, तब उपरोक्त दलील के आधार पर उस व्यक्ति को राज्य से क्षतिपूर्ति मिलने का कानूनी हक होना चाहिए.

जब नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को कोरोना वायरस के संकट की वजह से राष्ट्रव्यापी लॉक डाउन की घोषणा की थी, उनके इस कार्य ने एक झटके में असंख्य मजदूरों को आमदनी से वंचित कर दिया था, जिनमें अनुमानतः 14 करोड़ प्रवासी मजदूर शामिल थे, और उनमें से कोई दस करोड़ के लगभग अंतर्राज्यीय प्रवासी थे. लेकिन किसी हर्जाने की घोषणा नहीं की गयी, और आज तक न तो कोई क्षतिपूर्ति की गयी है, और न ही भविष्य में इसकी कोई संभावना दिखती है.

शुरू में सरकार ने सभी उपक्रमों को, जहां मजदूर कार्यरत थे, लॉक डाउन की अवधि का वेतन भुगतान करने के लिए कहा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को अमान्य कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने जब ऐसा कर दिया, तो भले ही कोई सुप्रीम कोर्ट की बुद्धिमत्ता के बारे में कैसे भी विचार रखता हो, लेकिन सरकार को स्वतः ही मुआवजे के भुगतान की जिम्मेदारी ले लेनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं किया गया. केंद्र सरकार की इच्छा थी कि राज्य सरकारें उन्हें कुछ राशि का भुगतान कर दें (बावजूद कि राज्य सरकारें फण्ड के लिए स्वयं लालायित थीं). लेकिन कौन भुगतान करेगा, यह तो लॉक डाउन घोषित करने से पहले निश्चित कर लिया जाना चाहिए था. मजदूरों को हर्जाने से केवल इस वजह से वंचित नहीं रखा जा सकता था कि इस बात पर झगड़ा था कि कौन सी सरकार इसके लिए जिम्मेदार थी.

आज जिस हकीकत का हम सामना कर रहे हैं, वह उन मजदूरों के मूलभूत अधिकारों का नितांत कल्पनातीत एवम एकदम भयावह हनन है. जो मूलभूत अधिकारों के साथ देश के नागरिक माने जाते थे, वे रातों रात भिखारियों में तब्दील हो गए हैं. दूसरे देशों के साथ, ख़ास कर अभिजात पूंजीपति देशों के साथ व्यतिरेक और अधिक स्पष्ट नहीं हो सकता था. सभी पूंजीवादी देशों में लॉक डाउन के दौरान मजदूरों को, जिनमें निजी क्षेत्र के मजदूर भी शामिल थे, वेतन भुगतान का काम वहां की सरकारों ने ले लिया था, जिन्होंने लॉक डाउन की घोषणा की थी.

इन भुगतानों का स्तर इतना बड़ा था कि लन्दन के फाइनेंसियल टाइम्स ने 8 मई को इनके बचाव में अपने सम्पादकीय में लिखा है – “कम्युनिस्ट क्रान्ति को छोड़कर, यह कल्पना करना मुश्किल लग रहा है कि किस प्रकार सरकारों ने लेबर, क्रेडिट तथा सामानों एवम सेवाओं के आदान प्रदान के निजी मामलों में लॉक डाउन के पिछले दो महीनों में तेज तथा भरपूर हस्तक्षेप किया है. रातों रात निजी क्षेत्र के लाखों लाख कर्मचारी सरकारी खजाने से अपनी तनख्वाह के चेक प्राप्त करने लगे हैं, और केन्द्रीय बैंकों ने वित्तीय बाज़ारों में इलेक्ट्रोनिक धन की बाढ़ ला दी है”. यह अदायगी किन्ही अनुकम्पा या मानवीयता या इस तरह की किसी उदात्त भावना से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह पूंजीवादी जनतंत्र के अन्दर व्यक्तियों के अधिकारों की स्वीकारोक्ति का द्योतक है. भारत के साथ यह वैषम्य यही दिखाता है कि इस देश में गरीबों को कोई वास्तविक अधिकार नहीं मिले हुए हैं, संविधान भले ही चाहे कुछ भी वादा करता हो.

गरीबों के अधिकारों को मान्यता प्रदान न करने का मनोभाव मध्यम वर्ग तथा सभ्रांत वर्ग के बड़े हिस्सों के दिलों में घर कर चुका है. यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट भी, जो जनता के अधिकारों का अभिरक्षक होता है, इससे अछूता नहीं रहा है. उस सरकारी आदेश को निरस्त करते हुए, जिसमें नियोक्ताओं से लॉक डाउन के दौरान मजदूरों को वेतन प्रदान करने की बात कही गयी थी, सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रश्न पूछा था – “नियोक्ताओं से वेतन भुगतान के लिए कैसे कहा जा सकता है, जब उद्यम बंद पड़े हैं”? लेकिन उसने यह प्रश्न नहीं पूछा, जिसको पहले प्रश्न के तुरंत बाद पूछा जाना चाहिए था कि – मजदूरों को बिना वेतन के कैसे रखा जा सकता है जब उद्यमों को बंद कर दिया गया है? उसने अगर इस प्रश्न को पूछा होता तो वह इस नतीजे पर पहुँच गया होता कि वेतन भुगतान करने की जिम्मेदारी सरकार की बनती है. तब उसने सरकार को निर्देश जारी किये होते, और इस प्रकार मजदूरों के अधिकारों की पुष्टि की जा सकती थी. इसके बदले उसने आमदनी के नुकसान का वजन उन्ही लोगों के कन्धों पर डाल दिया जो इस वजन को सबसे कम हद तक सहन करने की स्थिति में थे. ऐसा करना सामंती दौर की निशानी तो कही जा सकती है, लेकिन किसी लोकतंत्र की नहीं, जिसमें सार्वभौमिक अधिकार एवम कानून के समक्ष बराबरी के आदर्श होते हैं.

केंद्र सरकार ने जिस अस्पष्टता का परिचय दिया है, उससे इन अधिकारों के सवाल को सफलता के साथ पीछे धकेल दिया गया है, और वित्त मंत्री द्वारा घोषित ‘राहत पैकेज’ की प्रकृति से सम्बंधित बहस चर्चा के केंद्र में आ गयी है. उस पैकेज में, जैसा कि सभी भलीभांति जानते हैं, अर्थव्यवस्था को प्रेरित करने के लिए तमाम तबकों को ऋण उपलब्ध कराने के लिए तो बहुत से कदम उठाये गए हैं, लेकिन वित्तीय ट्रान्सफर के लिए कुछ नहीं किया गया है. बहुत से लोगों का कहना है, जो हमें भी ठीक लगता है, कि चूंकि अर्थव्यवस्था वर्तमान समय में मांग की कमी के दौर से गुजर रही है, इसलिए मांग को बढाने के लिए सरकारी खर्च का प्रयोग किये बिना केवल ऋण उपलब्ध करा देने मात्र का नतीजा यह होगा कि लोन लेने वाला भी कोई पैदा नहीं होगा. इस तरह, सरकार के पैकेज से न तो ऋण की मांग बढ़ेगी, न उत्पादन में वृद्धि होगी और न ही रोजगार में बढ़ोत्तरी हो पाएगी.

बहरहाल, राहत पैकेज के सम्बन्ध में इस बहस का मजदूरों की क्षतिपूर्ति के अधिकार से कुछ भी लेना देना नहीं है. भले ही वित्त मंत्री की यह धारणा सही हो कि अर्थव्यवस्था के सामने मांग की कमी की नहीं बल्कि ऋण की कमी की समस्या है, और जो पैकेज उन्होंने पेश किया है, वह अर्थव्यवस्था के उत्प्रेरण के लिए एकदम सही हो, तो भी वे मजदूरों को मुआवजा देने से इनकार नहीं कर सकती, जो बिना किसी अपनी गलती के, बल्कि पूरी तरह इस कारण से कि सरकार ने लॉक डाउन का हुक्मनामा जारी किया था, आमदनी से वंचित हो गए थे. अर्थव्यवस्था के लिए क्या कुछ किया जाना चाहिए, इस पूरे सवाल को मजदूरों के अधिकारों के सवाल से अलग करके देखा जाना चाहिए, हालांकि हमारे सहित बहुत सारे लोग इस बात में यकीन करते हैं कि मजदूरों की आमदनी के नुकसान की भरपाई असल में अर्थव्यवस्था में जान फूँकने का भी सही उपाय है.

इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि हम एक बहुत भारी मानवीय आपदा का सामना कर रहे हैं, जो स्वतन्त्रता के बाद के इतिहास में अभूतपूर्व है, तथा जो विभाजन के दिनों की अथवा 1943 के बंगाल के अकाल की याद दिलाती है. उत्तर भारत की असहनीय गर्मी में अपने गाँवों की ओर पैदल पदकते हुए लाखों प्रवासी मजदूरों की त्रासदी पर ध्यान केन्द्रित करते हुए लेकिन हमें उनके अधिकारों के उल्लंघन की ओर से नजरें नहीं फेर लेनी चाहिए. इसलिए अगर तो उनके अधिकारों के उल्लंघन की भरपाई नहीं की जाती है, तो उन्हें हमेशा के लिए द्वितीय श्रेणी के नागरिक में तब्दील कर देने की यह एक नजीर बन जायेगी.

संक्षेप में, सरकार भले ही लोगों को अर्थशास्त्र के विद्वानों तथा अन्य के द्वारा प्रस्तावित कदमों से हटकर कोई भी अन्य पैकेज प्रदान कर दे, लेकिन यह मजदूरों की क्षतिपूर्ति करने से इनकार नहीं कर सकती है. ऐसा न करना नागरिकों के अधिकारों का घोर उल्लंघन होगा, जो किसी भी लोकतंत्र में सीधे सीधे अस्वीकार्य होना चाहिए.

(संक्षिप्त हिंदी रूपान्तर – अशोक गर्ग )

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