अनुच्छेद 370 के विरोध में डॉ राम मनोहर लोहिया का नाम अमित शाह जैसे लोग जबरिया ले रहे हैं और साथ ही महान सांसद समाजवादी नेता मधु लिमए का नाम भी बेमतलब लिया जा रहा है। मधु लिमये जी तो 370 के महत्व को बहुत ही बारीकी से समझाया है और वे कभी भी कश्मीर से धारा 370 हटाने के पक्ष में नहीं थे ।
मधु लिमए जी ने तो धारा 370 का महत्व बताते हुए कहा कि जम्मू और कश्मीर को प्राप्त यह विशेष दर्जा आखिर है क्या ? जिस धारा 370 को लेकर इतना हंगामा खड़ा किया जा रहा है उसकी खास खास बातें क्या है धारा 370 उन प्रावधानों में आती है जिन्हें केवल राज्य की संविधान सभा की सहमत से समाप्त किया जा सकता है केंद्र ने यह सहमत प्राप्त न करना ही पसंद किया । लेकिन धारा 370 को समाप्त किए बिना राष्ट्रपति के माध्यम से केंद्रीय मंत्रिमंडल जम्मू कश्मीर में भारतीय संविधान के प्रावधानों को लागू कर सकता था और कर सकता है जो वहां प्रभावी नहीं किए गए थे स्थिति यह है कि मूल विलय पत्र में आने वाले विषय पर ही राज्य सरकार से सलाह मशविरा करना आवश्यक होता है ।
धारा 370 का मुद्दा उठाकर भाजपा गलत दिशा में निशाना साध रही है कश्मीर घाटी में भाजपा को कुछ भी समर्थन हासिल नहीं है ।
धारा 370 का हव्वा खड़ा करने के पीछे कोई उचित नहीं है हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीरियों के लिए उनकी स्वायत्तता का प्रश्न चाहे वह कितना भी आ वास्तविक क्यों ना हो उनकी पहचान का प्रतीक बन चुका है इसलिए उस दुखती रग पर हाथ रखने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है । नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के बारे में भी धारा 370 के बारे में गुमराह कर रहे हैं कश्मीर की स्थिति पर लोकसभा में चल रही बहस में हस्तक्षेप करते हुए 29 मार्च 1977 को अटल बिहारी बाजपेई ने सरकार की तरफ से घोषणा की थी की जम्मू और कश्मीर के संवैधानिक दर्जे में राज्य की जनता की सहमति के बिना कोई तब्दीली नहीं की जाएगी बाजपेई ने लोकसभा में जो कुछ कहा था उसने और धारा 370 में क्या फर्क है स्पष्ट है कि उस वक्त भाजपा के नेता ने जो कुछ कहा था और आज भाजपा जो कुछ कह रही है उसमें इस कदर विरोधाभास है इससे पार्टी की विश्वसनीयता पर आँच आना अवश्यंभावी है ।



