हबीब तनवीर के जन्मदिवस पर विशेष-
हबीब तनवीर: नाट्य-रँग के चितेरे
– सुनील कुमार कटियार
“यह बिल्कुल आवश्यक नहीं है कि शिक्षा हर एक मानव में कल्पना उत्पन्न कर दे। यह तो अलग तरह का प्राकृतिक उपहार है जो कुछ लोगों में ही पाया जाता है। कुछ साम्प्रदायिक लोग प्रगतिशील, जनवादी कला पर रोक लगाते हैं – फिल्म, नाटक,पेंटिंग आदि के खिलाफ़ हँगामा खड़ा करते हैं, उनमें इँसानियत नहीं है। उनमें मानवीय समझ और कल्पना का अभाव है। एजरा पाउंड की कविता की एक लाइन ‘beware tyranny of unimaginative’ – शरीफ़ाना अँदाज़ में कही हुई इससे ज़्यादा सख्त बात नहीं हो सकती। मेरा रंगकर्म, मेरा थियेटर अनपढ़ कलाकारों का केन्द्रक है। हमारे कलाकारों ने अपनी ज़िन्दगी के व्यवहारिक पहलुओं से ज्ञान प्राप्त किया। वे अनपढ़ ज़रूर हैं परंतु उन्हें अशिक्षित नहीं कहा जा सकता। मैं इस निष्कर्ष पर पँहुचा हूँ कि हमारी शिक्षा लोगों में कल्पनाशीलता पैदा करने के बजाय उन्हें कुँद बनाती है। साँस्कृतिक मूल्य हमारे आस-पास की ज़िन्दगी में बिखरे हुए हैं, लोगों के जीने-मरने की अदा ही संस्कृति है। परंतु हमारी शिक्षा इसे पहचानने में असमर्थ है। हमारी साँस्कृतिक विरासत गतिशील और बहुआयामी है। हमारे नाटक लिखित न होकर सीधे कलाकारों द्वारा खेले जाते हैं। लोकगीत ठहरी हुई चीज नहीं है। जो आज दिख रहा है, पचास-सौ सालों में ऐसा ही होगा, यह कहना मुश्किल है। लोकगीत को बनाता तो एक ही व्यक्ति है, लेकिन वह सामूहिकता लिये हुए जनता के गीत हो जाते हैं।”
— हबीब तनवीर, १२ सितम्बर, २००३, भारतीय नृत्य कला मंदिर, जनवादी लेखक संघ के छठवें राष्ट्रीय सम्मेलन में उनके उदबोधन के कुछ अंश।
हबीब तनवीर के नाटकों में देश की मिट्टी और उसकी आँचलिक संस्कृति के स्पष्ट दर्शन होते हैं। उनके नाट्य कलाकार भी छत्तीसगढ़ी तहज़ीब और भाषा से लैस हैं। उनके नाटकों में नौटंकी व नाचा शैली स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। नाचा छत्तीसगढ़ की पारम्परिक प्रतिष्ठापूर्ण लोकविधा है। नाचा का संसार न केवल विविधताओं से परिपूर्ण है, बल्कि इसमें सामाजिक जागरूकता का भाव भी है। छत्तीसगढ़ की लोक विधा नाचा को इस सदी के महान रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना और नाचा को विश्व रँगमँच पर प्रतिष्ठित किया। सदी के महान् रँगकर्मी हबीब तनवीर का जन्म ०१ सितम्बर, १९२३ को छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर में हुआ था। इनका पूरा नाम हबीब अहमद ख़ान था। इनके पिता हफ़ीज़ अहमद ख़ान मूल रूप से पेशावर (पाकिस्तान) से पलायन कर रायपुर के प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गए थे। हबीब तनवीर का बचपन रायपुर में ही बीता। उनकी शुरुआती शिक्षा रायपुर में ही हुई। नागपुर के मॉरिस कालेज से इन्होंने स्नातक की शिक्षा ग्रहण की तथा अलीगढ़ विश्वविद्यालय से एम. ए. किया। कालेज के समय से ही इन्होंने ‘तनवीर’ उपनाम से कविता लिखना शुरू कर दिया और साहित्य जगत में हबीब तनवीर के नाम से प्रतिष्ठित हुए। इस मध्य उन्होंने सैकड़ों कविताओं का सृजन किया।
वर्ष १९४५ में हबीब तनवीर मुंबई चले गये और ऑल इंडिया रेडियो से बतौर निर्माता जुड़ गये। उसी समय कुछ फ़िल्मों में गीत लिखे तथा कुछ फ़िल्मों में अभिनय भी किया। मुंबई में ही यह प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल हुए तथा इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) में काम करने लगे। ब्रिटिश काल में जब इप्टा के अधिकाँश वरिष्ठ रँगकर्मी जेल में डाल दिये गये, तब इनसे इप्टा को सँभालने के लिए कहा गया और हबीब तनवीर ने इस ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाया। मुंबई में काफ़ी समय तक रहते हुए प्रगतिशील लेखकों, फिल्मकारों, नाट्यकर्मियों के साथ प्रगतिशील जनवादी साहित्यक आंदोलन को एक नई दिशा दी।
वर्ष १९५४ में यह दिल्ली लौट आये और वहाँ कुदेशिया ज़ैदी के हिन्दुस्तान थियेटर के साथ काम किया। इसी मध्य उन्होंने बच्चों के लिए भी नाटक लिखे। कुदेशिया ज़ैदी के साथ हिन्दुस्तान थियेटर में काम करते हुए ही उनका ध्यान आँचालिक लोक-संस्कृति, लोक-धुनों व लोक-गीतों की ओर गया और उन्हें एहसास हुआ कि हमारी लोक संस्कृति, जिसमें मरने और जीने की जिजीविषा है, हमारे चारों ओर बिखरी पड़ी है और इसे थियेटर की बंद दुनियां में क़ैद नहीं किया जा सकता है। वर्ष १९५५ में हबीब तनवीर ने इंग्लैंड की यात्रा की और वहाँ की रॉयल अकैडमी ऑफ़ ड्रामेटिक्स आर्टस् (राडा) में प्रशिक्षण प्राप्त किया। यूरोप की यात्रा के दौरान इन्होंने वहाँ की थियेटर कला को बहुत नज़दीक से देखा। नाट्य कला में ‘बर्तोल्त ब्रेख्त’ के प्रयोगों का गहराई से अध्ययन किया। इसके अलावा पाश्चात्य नाट्य शास्त्र के तमाम पहलुओं के बारे में गहन जानकारी प्राप्त की।
वर्ष १९५८ में वे वापस छत्तीसगढ़ आए। वहाँ रात भर नाचा (छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति से जुड़ी एक नाट्य शैली) को देखा। हबीब तनवीर उस शैली और उनके कलाकारों से बहुत प्रभावित हुए। इसी वर्ष नाचा के छ: कलाकारों – ठाकुर राम, भुलवाराम, बाबूदास, मदनलाल, जगमोहन कामले, लालूराम – का चयन कर हबीब उन्हें दिल्ली ले आए। वर्ष १९५९ में प्रसिद्ध अभिनेत्री मोनिका मिश्रा के सहयोग से ‘नया थियेटर’ की स्थापना की, जिसमें आँचलिक लोक संस्कृति की रश्मियों को शामिल कर नाट्यकर्म को इंद्रधनुषी स्वरूप प्रदान किया गया। अभिनेत्री मोनिका मिश्रा से उनकी जोड़ी कुछ ऐसी जमी कि वे दोनों परिणय-सूत्र में बंध गए। उसी वर्ष उन्होंने नज़ीर अक़बराबादी के जीवन और उनकी रचनाओं से संबंधित नाटक ‘आगरा बाजार’ लिखा जो बेहद लोकप्रिय सिद्ध हुई। उर्दू-हिन्दी के मेलजोल से अठारहवीं सदी में आम फ़हम कविता कहने वाले शायर नज़ीर अकबराबादी की नज़्मों को नाट्य रूपक के बतौर पेश करते हुए हबीब तनवीर ने शायरी, संगीत, अभिनय और निर्देशन का बेहतर रसायन तैयार किया। यह प्रयोग दर्शकों को इतना पसंद आया कि मँचन की कई पुनरावृत्तियां हुईं। हालाँकि बाद के बरसों में नाटक की पुरानी चमक वे नहीं लौटा पाए, लेकिन शोहरत की बुलंदियाँ छू चुके ‘आगरा बाजार’ की ख़ुशबू से तरी होने की गरज़ दर्शकों पर सदा हावी थी।
दिलचस्प बुनावट वाले इस नाटक के मँच पर आगरा का बाज़ार है, जहाँ घोर मंदी छाई है और कुछ भी नहीं बिक रहा। एक ककड़ी वाले के दिमाग़ में यह बात आती है कि यदि कोई कवि उसकी ककड़ी के गुणों को बखानती कविता में लिख दे तो बिक्री ज़रूर बढ़ेगी। वह कई शायरों के पास जाता है पर कोई भी इस काम के लिए राज़ी नहीं होता। अंत में वह शायर नज़ीर के पास जाता है, जो फौरन उसका काम कर देते हैं। वह नज़ीर की लिखी ककड़ी पर कविता गाता हुआ आता है और उसके यहाँ ग्राहकों की भीड़ लग जाती है। फिर तो लड्डूवाला, तरबूज़ वाला आदि सब एक-एक करके वही करते हैं और जल्दी ही सारा बाज़ार नज़ीर के गीतों से गूँजने लगता है। इस मुख्य कथ्य के बीच एक बेरोज़गार युवा की कहानी पिरोई गई है, जो एक गणिका के फेर में पड़ा हुआ है और जो अंत में उसी पुलिस इंस्पेक्टर के हत्थे चढ़ता है, जिसे कभी प्रेम के खेल में उसने परास्त किया था।
‘आगरा बाज़ार’ गीत व नाट्य के समावेश का पहला सुविचारित प्रयोग था। इस नाटक का सांगीतिक ताना-बाना आज भी लगभग वैसा ही है – सिवाय दो-चार गानों के – विशेष कर ‘बंजारा नामा’ गीत के जिसे १९७० में शामिल किया गया था। इस गाने की धुन भटिंडा के स्वर्गीय हुकुम चन्द्र ख़लीली द्वारा तैयार की गई थी जो इस नाटक में फ़कीर का अभिनय भी किया करते थे। ‘आगरा बाज़ार’ का फ़लक दो शताब्दी पहले के आम भारतीय जीवन को समेटे है। हबीब तनवीर ने नज़ीर की भूली-बिसरी कविताओं को खंगाला और उन्हें तरतीब से जोड़कर आगरे के बाज़ार की कल्पना की। पहले नज़्में हावी थीं, लेकिन मुसलसल आलेख ‘आगरा बाज़ार’ हबीब तनवीर की ज़िन्दगी में प्रतिष्ठा और प्रशंसा की नई चमक लेकर आया। नज़ीर सच्चे अर्थों में एक ऐसे जनकवि थे, जिसने ठेलेवालों, बनियों, भिखारियों, आवारा छोकरों की फ़रमाइश पर कई बार गीत लिखे, पर उन्हें कभी एकत्रित कर छपवाने के फेर में नहीं पड़े। हबीब तनवीर ने भारी मशक्कत करते हुए नज़ीर की नज़में खोजीं और उन्हें सिलसिलेवार एक रूपक की शक्ल में पिरोया।
पूरी तरह नाटक न होकर भी इसमें जीवन का पूरा रस था। ‘आगरा बाज़ार’ का पहला मँचन १९ और २० अप्रैल १९५४ को दिल्ली के रामलीला ग्राउण्ड पर खादी प्रदर्शनी के सभागार में हुआ था। तब १, ३, और ५ रुपए के टिकट से दर्शकों ने इसे देखा था। पंद्रह नज़्मों और पचास पात्रों के साथ फैले इस नाटक का संगीत निर्देशन संगीतकार सतीश भाटिया ने किया था, जबकि विख्यात सितार वादक पं. रविशंकर ने इसकी धुनों को सँवारा था। इस नाटक की अपार सफलता ने हबीब तनवीर की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगा दिए। समय के साथ प्रस्तुति में तब्दीलियाँ होती गईं, मँचन निखरता गया। आगरे के प्रति दिली मोहब्बत, अवाम का आपसी सौहार्द्र, एकता और इंसानियत का पैग़ाम इस नाटक का मूल है। ख़ुद मियां नज़ीर ने बयान किया है – ‘अदना ग़रीब मुफ़लिस ज़रदार पैरते हैं, इस आगरे में क्या-क्या ऐ यार पैरते हैं।’ हबीब तनवीर ने नज़ीर की शायरी के जखीरे से करीब डेढ़ दर्जन कविताओं को चुना और उन्हें मुकम्मल धुनों में पिरोकर पेश किया। कथा के सूत्र हबीब तनवीर ने बड़ी ही सुरूचि से पिरोए और दृश्यों तथा मँच की बुनावट में इतनी जीवंतता दर्शायी मानो हम आगरे के बाज़ार में खड़े हों। सकारात्मक पहलुओं के बावजूद उन लोगों को थोड़ी निराशा थी, जिन्होंने इस नाटक के एक दशक पहले के प्रदर्शन देख रखे हैं। नाटक के किरदारों में प्राण फूँकने वाले अस्सी प्रतिशत से ज़्यादातर कलाकार अब प्रस्तुति से अनुपस्थित रहने लगे और कई बार हबीब तनवीर को औसत प्रतिभा के कलाकारों से ही काम चलाना पड़ा। कुछ ‘नया थियेटर’ छोड़ गए कुछ दुनिया से विदा हो गए और कुछ की उम्र शरीर और मन पर हावी हो गई। नए अभिनेताओं में उत्साह ज़रूर था पर पात्र को अपनी नैसर्गिक प्रतिभा से जीने के कौशल की कमी साफ़ दिखाई देती थी। लिहाज़ा ‘आगरा बाज़ार’ की आभा कुछ फीकी हो चली।
अपने ५० वर्षों की लम्बी यात्रा में हबीब तनवीर ने १०० से अधिक नाटकों का मँचन व सृजन किया है। उनका कला-जीवन बहुआयामी था। वह जितने अच्छे अभिनेता, निर्देशक व नाट्य-लेखक थे, उतने ही अच्छे गीतकार, कवि, गायक और संगीतकार भी थे। उन्होंने कई फ़िल्मों व नाटकों की बहुत अच्छी समीक्षायें भी कीं। उनकी नाट्य प्रस्तुतियों में लोक गीतों, लोक धुनों व लोक संगीत और नृत्य का सुन्दर प्रयोग सर्वत्र मिलता है। उन्होंने कई वर्षों तक देश भर के ग्रामीण अँचलों में घूम-घूम कर लोक-संस्कृति व लोक-नाट्य शैलियों का गहन अध्ययन कर तमाम लोकगीतों का सँकलन किया। उन्होंने लोक-संस्कृति व नाचा कलाकारों के साथ सामंजस्य बिठाकर नाटकों को एक नया रूप दिया। छठवें दशक की शुरुआत में ही नई दिल्ली में हबीब तनवीर की नाट्य संस्था ‘नया थियेटर’ और ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ की स्थापना एक समय में ही हुई। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि देश की सर्वश्रेष्ठ नाट्य संस्था ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ के पास जितने अच्छे, लोकप्रिय व मधुर गीतों का सँकलन है, उससे कहीं अधिक सँकलन ‘नया थियेटर’ के पास है।
एचएमवी जैसी बड़ी संगीत कँपनियों ने हबीब तनवीर के नाटकों के गीतों के कई ऑडियो कैसेट्स भी तैयार किए, जो बहुत लोकप्रिय हुए। आज़ादी के पहले हिन्दी रँगमँच पर पारसी थियेटर की पारम्परिक शैली का बहुत गहरा प्रभाव था। साथ ही, हिन्दुस्तान के नगरों व महानगरों में पाश्चात्य रँग-विधान के अनुसार नाटक खेले जाते थे। आज़ादी के बाद भी अंग्रेज़ी और दूसरी यूरोपियन भाषा के अनूदित नाटक और पाश्चात्य शैली हिन्दी रँगकर्म को जकड़े थी। उच्च वर्ग के आभिजात्यपन ने पाश्चात्य प्रभावित रूढ़ियों से हिन्दी रँगमँच के स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध कर रखा था और हिन्दी का समकालीन रँगमँच नाट्यप्रेमियों की इच्छाओं को संतुष्ट करने में अक्षम था। हबीब तनवीर ने इन्हीं रँग-परिदृश्यों को समर्थ किया और एक क्रांतिकारी रँग-आंदोलन का विकास किया। आज भी हबीब तनवीर के समय का नाट्य आंदोलन पूरे विश्व में अपने रँग बिखेर रहा है।
हबीब तनवीर का एक अन्य प्रख्यात नाटक ‘चरणदास चोर’ वर्ष १९८२ में एडिनबर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में पुरुस्कृत होने वाला सर्वश्रेष्ठ प्रथम भारतीय नाटक बना। इसी नाटक में लोक-धुनों व वाद्य-यंत्रों के द्वारा, जिसमें स्वर्ण कुमार ने गीत तथा राज वर्धन ने वाद्य-यंत्रों का नेतृत्व किया। उनके इस नाटक के कथानक में एक निरंकुश रानी द्वारा जिद्द न पूरी हो पाने से, एक सीधे-साधे अपने गुरु से प्रतिज्ञाबद्ध एक मासूम चोर पर अत्याचार व उसकी हत्या कराने की मार्मिक कहानी है और एक संदेश भी कि सत्ता की सनक कितनी जन-विरोधी व निरंकुश होती है। उसी तरह, उनका नाटक “बहादुर कलारिन” समाज में लोक मान्यताओं और नैतिकता के मूल्यों की रक्षा हेतु एक माँ द्वारा अपने सगे बेटे को बेदर्दी व बेरहमी से मार डालने की कथा है। उनका नाटक “पोंगा पंडित ” सामाजिक रूढ़ियों व सांस्कृतिक जड़ता पर कड़ी चोट देता है।
हबीब तनवीर अपने नाटकों के गीत व संगीत के लिए अपने ख़ास मित्र ‘साहिर लुधियानवी’ व ‘कैफ़ी आज़मी’ से निरंतर संपर्क में रहते थे। हबीब तनवीर एक अच्छे कवि भी रहे हैं। उनकी कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-
है अब तो कुछ सुखन का मेरे कारोबार बंद
रहती है तब असोच में लैलो-निहारबंद
दरिया सुखन की फ़िक्र का है मौज़दार बंद
हो किस तरह न मुँह में जुबां बार-बार बंद
जब आगरे की ख़ल्क का हो रोज़गार बंद
जितने हैं आज आगरे में कारखाना जात
सब पर पड़ी हैं आन के रोज़ी की मुश्किलात
किस-किस के दुख को रोइये और किसकी कहिये बात
रोज़ी के अब दरख़्त का मिलता नहीं है पात
ऐसी हवा कुछ आके हुई एक बार बंद
कुछ पँक्तियाँ और भी हैं-
जज़्बा-ए-दिल देखना भटका न देना राह से
मुंतज़िर होगा मिरा भी ख़ुद मिरा दिल-दार अभी
होंगी तो इस रह-गुज़र में भी कमीं-गाहें हज़ार
फिर भी ये बार-ए-सफ़र क्यूँ हो मुझे दुश्वार अभी
यह महान् रँगकर्मी आठ जून २००८ को इस जहाँ को छोड़ कर चला गया, लेकिन उनका रँगकर्म आज भी संपूर्ण विश्व में अपने सतरँगी आभा बिखेर रहा है।
हबीब तनवीर: एक संक्षिप्त परिचय
पूरा नाम
हबीब अहमद ख़ान
जन्म
01 सितम्बर, 1923 रायपुर छत्तीसगढ़
मृत्यु
08 जून, 2008 भोपाल मध्य प्रदेश
पत्नी
मोनिका मिश्रा
पिता
हफ़ीज अहमद ख़ान
शिक्षा
प्रारम्भिक: रायपुर, छत्तीसगढ़
स्नातक: मॉरिस कॉलेज, नागपुर महाराष्ट्र
एम.ए.: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
साहित्यिक रचनाएँ
प्रमुख कृतियाँ
आगरा बाजार १९५४, शतरंज के मोहरे १९५४, लाला शोहरत राय १९५४, मिट्टी की गाड़ी १९५८, (मृच्छकटिकम्) गाँव का नाम ससुराल मोर, नाँव दमाद १९७३, चरणदास चोर १९७५, बहादुर कलारिन, चन्दा और लोरिक, रानी हिरमा की कहानी, मुद्राराक्षस, पोंगा पंडित २००२, दि ब्रोकेन ब्रिज १९९५, जहरीली हवा २००२, राजरक्त २००६, मंगलू दीदी, सड़क, कामदेव का अपना वसंत, ऋतु का सपना, शाजापुर की शाँताबाई, जिन लाहौर नहीं देख्या वो जन्मया ही नहीं
फ़िल्में
फुटपाथ १९५३, राही १९५३, चरणदास चोर १९७५, गाँधी १९८२, ये वो मंजिल नहीं १९८७, हीरो हीरालाल १९८८, प्रहार १९९१, दि बर्निंग सीजन १९९३, दि राइजिंग आफ मंगल पांडेय २००५, ब्लैक एँड व्हाइट २००८
पुरस्कार एवं उपलब्धियाँ
१९६९
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
१९८३
पद्मश्री पुरुस्कार
१९९६
संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप
१९९०
कालिदास सम्मान
१९७२-१९७८
राज्य सभा सदस्य
१९८२
सर्वश्रेष्ठ नाटक पुरुस्कार (चरणदास चोर) एडिनबर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल
२००२
पद्म भूषण पुरुस्कार
भवभूति सम्मान
पी एच डी व डी लिट की मानद उपाधि
लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड
सन्दर्भ:
हबीब तनवीर: बायोग्राफी
www.jivanhindi.com
हबीब तनवीर: भारतकोश
तनवीर का रंग संसार-महावीर अग्रवाल
हबीब तनवीर का लोक संसार-अनामिका
रंगायन:३, हबीब तनवीर
लेखक परिचय:
सुनील कुमार कटियार : जनवादी लेखक संघ की उत्तर-प्रदेश राज्यपरिषद् के सदस्य तथा जनवादी लेखक संघ की केन्द्रीय परिषद के सदस्य, उत्तर प्रदेश सहकारी फ़ेडरेशन से सेवा निवृत्त, जनवादी चिंतक, स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन, शिक्षा-एम०ए० अर्थशास्त्र, जनपद फर्रुख़ाबाद में निवास।
आप साहित्यकार तिथिवार के नियमित पाठक हैं और आपकी टिप्पणियाँ लेखकों का उत्साहवर्धन करते रहे हैं।
मोबाइल नं० ७९०५२८२६४१, ९४५०९२३६१७ मेल आईडी- sunilkatiyar57@gmail.com
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