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और अब सावरकर पर उर्दू में किताब!

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आलेख – संजय पराते

इतिहास का एक स्थापित तथ्य यह है कि आरएसएस ने कभी भी स्वतंत्रता के संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया, इसलिए उसके कहने को भी कोई स्वाधीनता संग्राम सेनानी नहीं है। हां, इस दौरान उसकी अंग्रेजी भक्ति और स्वाधीनता सेनानियों के खिलाफ मुखबिरी के सैकड़ों ऐतिहासिक तथ्य जरूर उजागर हैं।

आज आरएसएस अपने आपको स्वाधीनता संघर्ष का योद्धा दिखाने के फेर में तरह-तरह के करतबों में जुटी नजर आती है, ताकि आम जनता की नजरों में वैधता प्राप्त कर सके। लेकिन इस मामले में घुमा-फिराकर उनके पास एक ही व्यक्ति है सावरकर, जिसे वे हर तरह के जुए में जोतने की कोशिश में लगे रहते हैं। लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ सावरकर की लड़ाई भी उसी समय तक जारी रहती है, जब तक वे कांग्रेसी थे और जब तक एक माफीवीर पेंशनयाफ्ता हिंदू महासभाई के रूप में उनका पदार्पण नहीं होता। आजादी के बाद फिर उनका नाम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या में शामिल एक संदिग्ध व्यक्ति के तौर पर ही उछलता है। उनका पूरा जीवन हिंदुत्व की नफ़रती विचारधारा को ही पालने-पोसने में गुजर गया।

नेशनल कौंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज शिक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाली एक संस्था है, जिसे उर्दू परिषद के नाम से भी जाना जाता है। संघी गिरोह की उर्दू से हिकारत किसी से छुपी हुई नहीं है और वे इस खूबसूरत और प्यारी भाषा को, जिसका जन्म हमारे देश की मिट्टी में ही हुआ है, को मुल्ला-मौलवी और आतंकवाद पैदा करने वाली भाषा ही मानते हैं। इस परिषद ने, जिस पर केंद्र सरकार का पूरा प्रशासनिक नियंत्रण है, ने हाल ही में सावरकर पर लिखी पुस्तक का उर्दू अनुवाद प्रकाशित किया है। इस पुस्तक के विमोचन समारोह में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल ने दावा किया है कि यदि सावरकर के बताए मार्ग पर चला जाता, तो भारत को संभावित विभाजन से बचाया जा सकता था। यह इतिहास का विकृतिकरण और मिथ्याकरण करना है, क्योंकि भारत विभाजन की वैचारिक नींव रखने वालों में, वास्तव में, सावरकर का नाम ही प्रमुखता से सामने आता है। बाद में, सावरकर के इस विचार को मुस्लिम लीग ने आगे बढ़ाया।

मूल किताब 2021 में सामने आई थी, जिसका नाम था — वीर सावरकर : द मैन हू कुड हैव प्रीवेन्टेड पार्टिशन। इसके लेखक उदय माहुरकर और चिरायु पंडित हैं। इसी पुस्तक का उर्दू अनुवाद जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ ने किया है, जिसका विमोचन पिछले दिनों प्राइम मिनिस्टर म्यूजियम में किया गया था। इसके बावजूद कि पूरी किताब में सावरकर की हिन्दुत्व की विचारधारा का बचाव किया गया है, विमोचन समारोह में माहुरकर ने दावा किया कि सावरकर मुस्लिमों समेत सभी सामाजिक वर्गों की भागीदारी को देश के सर्वांगीण विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानते थे और वे भारत विभाजन के सख्त विरोधी थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि पुस्तक “एक खास विचारधारा द्वारा फैलाई गलत धारणाओं” का खंडन करती है। सभी समझ सकते हैं कि यह खास विचारधारा कौन-सी है, जिसका किताब में खंडन किया गया है। यह खास विचारधारा वामपंथी विचारधारा है, जिसके खिलाफ वे हवा में तलवार भांज रहे हैं। उल्लेखनीय है कि माहुरकर भारत सरकार के सूचना आयुक्त हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि भारत सरकार को सही सूचनाएं देने के बजाए उन्होंने आम जनता के बीच वैचारिक भ्रम और कुहासा फैलाने की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी ओढ़ ली है। सावरकर के बारे में जो ऐतिहासिक तथ्य हैं, वे दस्तावेजी हैं और वामपंथ ने उसे अपनी कल्पना से गढ़ा नहीं है।

दरअसल, संघी गिरोह को वैज्ञानिकता से, तथ्यों से और ऐतिहासिक सच्चाई से हमेशा से ही परहेज रहा है। आज भाजपा सरकार अपनी सत्ता के ताकत के सहारे सावरकर को लेकर एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रही है, जो ऐतिहासिक प्रमाणों के उलट है। इतिहास यही है कि मुस्लिम लीग ने 1940 में द्विराष्ट्र के सिद्धांत को अपनाया था, जबकि सावरकर ने 1937 में ही हिंदू महासभा के समावेश में भाषण देते हुए ने कहा था : “देश में दो राष्ट्र हैं हिंदू और मुस्लिम।” इस प्रकार, मुस्लिम लीग तो केवल हिंदू महासभा की नकल करके बढ़त लेने की कोशिश कर रही थी। इतिहास की सच्चाई यही है कि आजादी के बाद जब सरदार वल्लभभाई पटेल देशी रियासतों को भारत में मिलाने का अभियान चला रहे थे, उस समय त्रावणकोर के दीवान सीपी रामासामी ने भारत से स्वतंत्र होने की घोषणा की थी और सावरकर ने इसका समर्थन किया था, ताकि एक धर्मनिरपेक्ष भारत के गठन को मात दी जा सके। संघी गिरोह स्वाधीन भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने का सपना पाले हुए थे और उन्होंने धर्मनिरपेक्ष भारत की स्थापना का पुरजोर विरोध किया था। इसी विरोध का एक दुष्परिणाम था, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या, जिसकी जिम्मेदारी के प्रति सावरकर और हिंदू महासभा हमेशा संदिग्ध रहे हैं।

ऐसे विवादास्पद राजनीतिक हस्तियों पर कोई किताब प्रकाशित करने का उर्दू परिषद का इससे पहले कभी कोई इतिहास नहीं रहा है। लेकिन यदि अब ऐसा हो रहा है, तो साफ है कि उर्दू परिषद जैसी साहित्यिक संस्था का भी अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा दुरूपयोग कर रही है। उर्दू परिषद की स्वायत्तता का हरण आज का सबसे बड़ा समाचार है।

(टिप्पणीकार संजय पराते अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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