पीएम आवास के आंकड़ों पर आमने-सामने बघेल–शर्मा : आंकड़ों की जंग में सत्ता पक्ष ने ‘निर्माण’ को हथियार बनाया, विपक्ष ने ‘स्वीकृति और पोर्टल’ पर उठाए सवाल
पीएम आवास पर आमने-सामने बघेल–शर्मा : आंकड़ों की जंग में सत्ता पक्ष ने ‘निर्माण’ को हथियार बनाया, विपक्ष ने ‘स्वीकृति और पोर्टल बंद होने’ पर उठाए सवाल
September 2026 प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर
रायपुर,छत्तीसगढ़ में लंबे समय से चल रही राजनीतिक बहस मंगलवार को उस स्वास्थ्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर पहुंच गई, जहां आरोप-प्रत्यारोप के बजाय पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा एक ही मंच पर इस मुद्दे पर आमने-सामने थे।
रायपुर प्रेस क्लब में हुई इस खुली बहस में दोनों नेताओं ने अपने-अपने कार्यकाल के आंकड़े रखे और एक-दूसरे के दावों को चुनौती दी।
यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण रही कि प्रधानमंत्री आवास जैसे सीधे गरीब परिवारों की छत से जुड़े मुद्दे पर सत्ता और विपक्ष ने पहली बार इस तरह सार्वजनिक रूप से ‘स्वीकृत आवास’, ‘स्वीकृत लेकिन लंबित’, ‘निर्मित आवास’, ‘केंद्र की मंजूरी’ और ‘राज्य की भूमिका’ जैसे अलग-अलग बिंदुओं पर अपना पक्ष रखा।
विजय शर्मा का पक्ष : ‘निर्माण हुआ, पैसा खर्च हुआ और लक्ष्य पूरा किया’ सरकार ने

उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने बहस में मौजूदा सरकार के प्रदर्शन को अपने पक्ष का सबसे बड़ा आधार बनाया। उनका कहना था कि साय सरकार के कार्यकाल में अब तक 11 लाख 75 हजार आवास पूरे हो चुके हैं और आवास निर्माण पर लगभग 16 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हाल में 3 लाख 65 हजार नए मकानों की स्वीकृति मिली है। औसतन 1600 मकान रोज बन रहे हैं।
विजय शर्मा का सबसे बड़ा राजनीतिक आरोप पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर था। उन्होंने दावा किया कि पिछली सरकार के पांच वर्ष में वित्तीय स्वीकृति लगभग 3,900 करोड़ रुपये थी, जबकि वर्तमान सरकार लगभग तीन वर्ष में करीब 16 हजार करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। उन्होंने पिछली सरकार के दौरान आवास निर्माण की गति और केंद्र से मिले अवसरों का उपयोग नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाए।
विजय शर्मा ने बहस को केवल ‘कितने मकान बने’ तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने 7.81 लाख PWL आवासों का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि केंद्र की ओर से उपलब्ध कराए गए आवासों को स्वीकार करने में तत्कालीन सरकार की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने 2020-21 में केंद्र द्वारा दिए गए 6.48 लाख आवासों के लक्ष्य को स्वीकार नहीं किए जाने का भी दावा किया।
विजय शर्मा की पूरी दलील का सार यह था:
केंद्र ने अवसर दिया, लेकिन पिछली सरकार ने पर्याप्त आवास नहीं बनाए; वर्तमान सरकार ने स्वीकृति को निर्माण में बदला। वर्तमान सरकार ने नक्सल पीड़ित, पुनर्वासित नक्सल के लिए भी 15000 आवास की योजना स्वीकृत की है।
यानी भाजपा ने बहस का केंद्र ‘निर्माण की गति’ और ‘गरीब को वास्तव में मिला मकान’ को बनाया।
भूपेश बघेल का पक्ष : ‘पहले स्वीकृति और पोर्टल का हिसाब बताइए’
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बहस को दूसरे कोण से दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना के इतिहास, यानि 2011 की जनगणना के अनुसार 26 लाख आवासहीनों, पीडब्लूए तथा आवास प्लस सूची और अलग-अलग वर्षों में मिली स्वीकृतियों का संदर्भ दिया।
बघेल का तर्क था कि 2015 16 से आवंटित आवास योजना में केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि कितने मकान बनाए गए। यह भी बताना होगा कि किस सरकार के समय कितने आवास स्वीकृत हुए, कितने स्वीकार किए गए, कितने निर्माणाधीन रहे और कितने पूरे हुए।
उन्होंने 2022-23 के दौरान पोर्टल बंद होने को अपने बचाव का महत्वपूर्ण आधार बनाया। उनका कहना था कि पोर्टल बंद होने के कारण उनकी सरकार के समय प्रधानमंत्री आवास योजना की प्रक्रिया प्रभावित हुई और केंद्र से राशि उपलब्ध नहीं हो सकी।
बघेल ने वर्तमान सरकार की ओर से बताए जा रहे आवासों के आंकड़ों को जोड़ते हुए दावा किया कि अलग-अलग समय में विष्णुदेव सरकार बनने के बाद 18 लाख, फिर 3 लाख, 3 लाख से अधिक और हाल में 3.65 लाख जैसी स्वीकृतियां हुई हैं और इन्हें जोड़ने पर आंकड़ा बहुत बड़ा हो जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब विष्णुदेव सरकार बनने के बाद 27 लाख से अधिक आवास स्वीकृत हो चुके हैं तो वास्तव में कितने घर बन चुके हैं?
भूपेश बघेल की दलील का सार यह था कि स्वीकृति को उपलब्धि बताने के बजाय सरकार को यह बताना चाहिए कि स्वीकृत आवासों में से वास्तव में कितने मकान बनकर तैयार हुए।
सबसे बड़ा विवाद : ‘स्वीकृति’ बनाम ‘निर्माण’
आज की बहस का असली राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र यही रहा।
विजय शर्मा स्वीकृतियों के साथ-साथ निर्माण की संख्या पर जोर दे रहे थे, जबकि भूपेश बघेल स्वीकृतियों और पोर्टल की प्रक्रिया के आधार पर पिछली सरकार की स्थिति समझा रहे थे।
केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जुलाई 2026 में लोकसभा में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के पिछले पांच वर्षों के आंकड़े जारी किए थे। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2021-22 से 2025-26 के दौरान छत्तीसगढ़ में 13,54,352 आवास स्वीकृत हुए, जिनमें 9,63,548 पूरे और 3,90,804 निर्माणाधीन बताए गए थे।
इसका अर्थ यह है कि सरकारी आंकड़ों में भी ‘स्वीकृत’ और ‘पूर्ण’ आवास अलग-अलग श्रेणियां हैं। इसलिए राजनीतिक बहस में इन दोनों को एक-दूसरे का पर्याय मानना तथ्यात्मक भ्रम पैदा कर सकता है।
पोर्टल का विवाद : आंकड़ों में किसकी बात कितनी सही?
यह आज की बहस का सबसे पेचीदा हिस्सा रहा।
बघेल का दावा: उनके कार्यकाल में कुछ समय तक PM आवास का पोर्टल बंद था और इसी वजह से आवासों की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
शर्मा का जवाब: पोर्टल बंद होने की बात को जिस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, वह भ्रामक है। उन्होंने कहा कि PM आवास की प्रक्रिया और तत्कालीन सरकार द्वारा नए नाम से शुरू किए गए “मुख्यमंत्री न्याय आवास योजना ” की प्रक्रिया अलग थी। साथ ही उन्होंने यह सवाल उठाया कि स्वीकृति, स्वीकार्यता और निर्माण को एक साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
बहस का सबसे दिलचस्प राजनीतिक क्षण
बहस के दौरान भूपेश बघेल ने यह स्वीकार किया कि अगर उनकी सरकार के कार्यकाल में पर्याप्त आवास नहीं बने तो जनता ने चुनाव में उन्हें इसकी सजा दी। दूसरी तरफ विजय शर्मा लगातार यह कहते रहे कि पूर्व मुख्यमंत्री को वास्तविक स्थिति स्वीकार करनी चाहिए और आंकड़ों को लेकर भ्रम पैदा नहीं करना चाहिए।
इससे बहस महज प्रशासनिक आंकड़ों की नहीं रही, बल्कि 2018–23 की कांग्रेस सरकार और 2023 के बाद की भाजपा सरकार के प्रदर्शन की राजनीतिक तुलना में बदल गई।
इस बहस से किसे क्या हासिल हुआ?
1. भाजपा को ‘अपने घोषणा पत्र के वायदे की डिलीवरी’ का मुद्दा मिला
सत्ता पक्ष के लिए सबसे मजबूत बिंदु 11.75 लाख पूर्ण आवास और करीब 16 हजार करोड़ रुपये खर्च का दावा है। यदि सरकार इन आंकड़ों को आधिकारिक MIS से विधानसभा क्षेत्रवार और वर्षवार साबित कर देती है, तो यह विपक्ष के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
2. कांग्रेस ने बहस को ‘हिसाब-किताब’ में बदलने की कोशिश की सरकार
भूपेश बघेल ने सीधे तौर पर सरकार से पूछा कि कुल स्वीकृति कितनी है और वास्तविक निर्माण कितना हुआ है। यह राजनीतिक रूप से प्रभावी रणनीति है, क्योंकि ‘स्वीकृति’ और ‘निर्माण’ के बीच का अंतर किसी भी सरकारी योजना के मूल्यांकन का महत्वपूर्ण पैमाना है।
3. दोनों पक्षों की सबसे बड़ी कमजोरी—अलग-अलग आधार-वर्ष
इस पूरे विवाद में एक बड़ी समस्या यह है कि दोनों नेता अलग-अलग समयावधियों के आंकड़े सामने रख रहे हैं। एक तरफ पांच वर्ष के केंद्रीय आंकड़े हैं, दूसरी तरफ पूरे PMAY काल के आंकड़े, तीसरी तरफ 2023 के बाद की सरकार के आंकड़े और चौथी तरफ अलग-अलग तारीखों की नई स्वीकृतियां।
इसलिए जब तक एक एकीकृत वर्षवार तालिका सामने नहीं आती, तब तक केवल भाषण के आधार पर किसी एक पक्ष को पूर्णतः सही घोषित करना उचित नहीं होगा। दरअसल भाजपा सरकार के पीएम आवास में 18 लाख के आंकड़े से नई सरकार की शुरुआत के दावे संकल्प के थे न कि नए आवासों की स्वीकृति के, इसे विजय शर्मा ने स्वीकार किया जबकि भूपेश बघेल ने अपने कार्यकाल में अपेक्षित लक्ष्य के अनुरूप पीएम आवास न बनवा पाने की ग़लती को स्वीकार किया और इसी कारण जनता ने 2023 के चुनाव में सरकार को हटाने का निर्णय किया इसे जनता का दंड के रूप में स्वीकार किया।
कुल मिला कर रायपुर प्रेस क्लब में अचानक हुए इस आयोजन की चर्चा पूरे देश में रही। त्योहारों के दिनों में 15 सितंबर की सुबह 10 से 10.30 बजे आयोजन का कंफर्मेशन हुआ और 11.30 से शुरुआत की जानी थी और भूपेश बघेल भी अपने दूसरे कार्यक्रम को छोड़ कर 11.30 तक प्रेस क्लब पहुंच गए थे इसकी चर्चा होती रही। गृहमंत्री के बहस में आने के कारण भरपूर पुलिस व्यवस्था से प्रेस क्लब में प्रवेश के लिए भी कई वरिष्ठ पत्रकारों को रोक -टोक का शिकार होना पड़ा।


