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आदिवासी युवक को नक्सली समझकर सीने और सर में गोली मारकर हत्या कर दी, सीआरपीएफ ने गलती मानी

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रोशन की मां रानीमय होरो और पत्नी जोसफिना होरो का कहना है कि 20 मार्च की सुबह रोशन होरो खाल लेकर सांडी गांव नगाड़ा बनवाने के लिए निकला था। वह खेती-बारी कर जीवन यापन करता था। वह आपराधिक छवि का व्यक्ति नहीं था। डेढ़ साल पहले तक वह सीएनआई चर्च का प्रचारक भी था। उसका छोटा भाई जुनास फौज में है और सबसे छोटा भाई पढ़ाई कर रहा है। उसकी तीन छोटी-छोटी बेटियां है, एलिना (12 वर्ष), आकांक्षा (8 वर्ष) और अर्पित (3 वर्ष) हैं।

इस घटना पर खूंटी एसपी आशुतोष शेखर का कहना है कि गुरुवार (19 मार्च) की रात पीएलएफआई (पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया) के साथ पुलिस और सीआरपीएफ की संयुक्त टीम की मुठभेड़ हुई थी। शुक्रवार (20 मार्च) की सुबह मुरहू थाना क्षेत्र के कुम्हारडीह गांव के आसपास छापामारी के लिए मुरहू थाना, सैट और सीआरपीएफ की टीम निकली थी। इसी दौरान बाइक में सवार रोशन होरो वहां से गुजर रहा था।

छापामारी दल द्वारा उसे रूकने के लिए कहा गया लेकिन वह बाइक रोककर भागने लगा। नहीं रूकने पर गोली चला दी गयी, जिससे उनकी मौत हो गयी। मृतक रोशन होरो का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। झारखंड पुलिस मृतक के परिजनों के साथ है वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देश के आलोक में हरसंभव सहयोग करेंगे। घटना की मजिस्ट्रेट जांच करायी जा रही है।

झारखंड पुलिस के आईजी अभियान साकेत कुमार सिंह का कहना है कि प्रथम दृष्टया मामला मनवीय भूल का लगता है। गुरुवार रात उग्रवादी दस्ते की मौजूदगी की सूचना पर अभियान शुरु हुआ था। शुक्रवार को दूसरी टुकड़ी अभियान में शामिल हुई, इसी दौरान घटना हुई। पुलिस मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच करायेगी।

वहीं इस घटना पर झारखंड के नवनियुक्त डीजीपी एमवी राव कहते हैं कि पुलिस ने गलतफहमी में गोली चलायी है। किसी की हत्या का इरादा नहीं था। दोषी पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज करने का निर्देश दे दिया गया है। केस दर्ज कर कार्रवाई की जाएगी। किसी को भी नहीं बख्शा जाएगा। इनका कहना है कि पुलिस पूरे मामले में किसी तरह की लीपापोती नहीं कर रही है। पूरे मामले की जांच भी करायी जाएगी और सरकार के नियमानुसार भुक्तभोगी के परिवारवालों को हर संभव सहायता की जाएगी।

पुलिस के अनुसार रोशन होरो के शव का मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में डॉक्टरों की एक टीम द्वारा पोस्टमार्टम भी कर दिया गया है और इसकी वीडियोग्राफी भी करायी गयी है।

वैसे तो इन पुलिस अधिकारियों के बयान में काफी झोल नजर आता है और पुलिस की कार्यपद्धति पर भी काफी सवाल खड़े होते हैं। नक्सल ऑपरेशन के दौरान ऑपरेटिंग स्टैंडर्ड प्रोसिजर (ओएसपी) कहता है कि बिना हथियार देखे किसी पर गोली नहीं चलानी है, तो फिर इस ओएसपी का पालन वहां पर क्यों नहीं किया गया? इस अभियान का नेतृत्व सीआरपीएफ की 94वीं बटालियन के टूओसी और खूंटी के एएसपी अनुराग राज कर रहे थे, तो क्या इन्होंने गोली चलाने की अनुमति दी थी? पुलिस रोशन को दौडक़र भी पकड़ सकती थी या फिर पैर पर गोली मारकर घायल कर सकती थी, लेकिन सीधा सर व सीने पर गोली क्यों मारी गयी? क्या किसी पर भी नक्सली होने का संदेह होने पर सीधा गोली मारने का अधिकार हमारे पुलिस के पास है?

रोशन होरो के पास भैंस का चमड़ा था, उन्हें लगा होगा कि पुलिस के पास पकड़ाने पर उसे फंसाया जा सकता है, इसीलिए वह बाइक छोडक़र भागने लगा और पुलिस ने उनके सर और सीने को निशाना बनाते हुए तीन गोली चलाई, जिसमें दो गोली उन्हें लगी। तो सवाल उठता है कि क्या पुलिस ने उसे पकडऩे के लिए गोली चलायी या मौत की नींद सुलाने के लिए? यह घटना नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस द्वारा चलाये जा रहे अभियानों में तमाम कायदे-कानूनों को धता बताने की एक बानगी मात्र है, जिसमें इनकी पोल खुल गयी है और पुलिस अधिकायिों को गलती स्वीकार करनी पड़ी है।

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